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जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान -रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

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जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान


आँख में अंगार, साँसों में लिए तूफान,
जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।


धर्म-पुत्रों ने नहीं देखा कपट का जाल,
फाँसती ही गई उनको शत्रु की हर चाल।
भीम-अर्जुन भी रहे अपमान भीषण झेल,
बहुत महँगा पड़ रहा है, यह जुए का खेल।
द्रौपदी-सी चीखती है यह धरा असहाय,
वस्त्र खींचे जा रही धृतराष्ट्र की संतान,
जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।
मौन बैठे भीष्म द्रोणाचार्य हैं चुपचाप,

कर रहे नत शिर, युधिष्ठिर मौन पश्चात्ताप।
हँस रहा दुर्योधनों-दुःशासनों का झुण्ड,
भूमि का जीवन बनेगा क्या नरक का कुंड?
‘शत्रु शोणित से धुलेंगे द्रोपदी के केश’
भीम! उठकर के सभा में यह प्रतिज्ञा ठान।

जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।
न्याय घायल, सत्य के मन में व्यथा है आज,
घट रही फिर महाभारत की कथा है आज।
स्वार्थ गाते, नग्न हो पशुता रही है नाच,
पाण्डुनन्दन मोह की गाथा रहे हैं बाँच।


बन्धुता रोती, सिसकते मित्रता के प्राण,
सामने कौरव खड़े हैं माँगते रण-दान,
जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।


हो रहा है शक्ति-मद में शत्रु रक्त-पिपासु,
कौन है, केशव यहाँ पर न्याय का जिज्ञासु?
हिंस्र पशुओं के नयन हर ओर आज सतृष्ण,
संधि की बातें न छेड़ो ओ कलाधर कृष्ण।
गोपियों का दल नहीं यह कौरवों का झुण्ड,
बाँसुरी फेंको उठाओ पांचजन्य महान,
जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।


उठ भीम, उठ भारत महाभारत ठनेगा आज,
हम बचा करके रहेंगे द्रोपदी की लाज।
भीम का प्रण पूर्ण होने पर बंधेगे केश,
कृष्ण! दो अबिलम्ब गीता का अमर उपदेश।
बज रही भेरी नहीं थमते रथों के अश्व,
कहो अर्जुन से करें गांडीव का संधान,
जाग, भारतवर्ष के सोए हुए अभिमान।


-रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

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