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जाग रे कृषक( किसानों के लिए कविता )

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जाग रे कृषक ( किसानों के लिए कविता)

जाग रे! कृषक, तू है पोषक ,नहीं तेरा मिशाल रे।
अपनी कृषि पद्धति की हर नीति हुई बदहाल रे।

गाय-बैल अपने सखा  जैसे।
हम संग मिलके काम करते।
गोबर खाद की गुण  निराली
पोषक तत्वों की खान रहते ।
खेत में रसायन मिलाके हमने
किया किसान मित्र ‘केंचुआ’ का हलाल रे ।।
जाग रे !कृषक ….

धरती मां में सौ गुण समाए ।
हर पौधे के बीज को उगाए ।
पौधों भी कृतज्ञता से पत्ते को
गिराके भूमि उपजाऊ बनाए ।
समझ ना पाया तू प्रकृति चक्र
किया आग से धरा को तुमने लाल रे ।।
जाग रे! कृषक ….

भीषण पावक से अपनी धरा
खो देती है अपनी भू  उर्वरा।
मर जाते हैं फिर कीट पतंगा
खाद्य श्रृंखला चोटिल गहरा ।
खेत सफाई की चाह में तुमने
भू जलाके बंजर बनाके खुद से की सवाल रे।।
जाग रे! कृषक. . . .

 मनीभाई ‘नवरत्न’, छत्तीसगढ़

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