KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जगन्नाथ रथयात्रा पर कविता

रथ यात्रा दूसरे शब्दों में रथ महोत्सव एकमात्र दिन है जब भक्तों को मंदिर में जाने की अनुमति नहीं है, उन्हें देवताओं को देखने का मौका मिल सकता है। यह त्योहार समानता और एकीकरण का प्रतीक है।रथ यात्रा भारत के पुरी में जून या जुलाई के महीनों में आयोजित भगवान जगन्नाथ (भगवान विष्णु का अवतार) से जुड़ा एक प्रमुख हिंदू त्योहार है| पुरी रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है और हर साल एक लाख तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती है, न केवल भारत से बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों से भी।

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जगन्नाथ रथयात्रा पर कविता

“हे प्रभु जगन्नाथ थाम मेरा हाथ,
अपने रथ में ले चल मुझे साथ।
लुभाये न मुझको अब कोई पदार्थ
मेरा तो बस अब एक ही स्वार्थ,
धर्म युद्ध हो या कर्म युद्ध हो
तू बने सारथि, मैं बनूँ पार्थ ।
मैं हूँ अन्जान बन के मेरा नाथ
अपने रथ में ले चल मुझे साथ।”

उसके हाथ में
कोई हथियार नहीं था
उसका चेहरा बड़ा भव्य था
वह खुली जीप में आया था

उसके आगे पीछे
लम्बा चौड़ा काफ़िला था वाहनों का
माथे पर पट्टियाँ बांधे
जोश में नारे लगाती
अनुयायियों की
उन्मादी भीड़ थी
उसके चारों ओर

वह रौंदता जा रहा था
मेहनतकशों की बनायी
उम्मीदों की सड़क

उसके आने से पहले ही
लोग दुबक चुके थे घरों में
किसी अनिष्ट की आशंका से
बंद हो गए थे बाज़ार
फैला हुआ था सन्नाटा चारों ओर
कोई नहीं देख रहा था
उसकी सवारी
अनुयायियों की उन्मादी भीड़ के सिवा

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1 Comment
  1. Akil khan says

    Bahut hi sunder kavita.