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जनता राजा-मनीभाई नवरत्न

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जनता राजा-मनीभाई नवरत्न

(1)
लोकतंत्र क्या है?
स्वतंत्रता का पर्याय ।
जहाँ होती है जनता राजा,
और चलती है
उसके बनाये गये कानून ।
लोकतंत्र में,
मंत्री होते हैं सेवक ।
चुने जाते हैं राजा से
हर पाँच साल में।
पर सेवा तो ,
निस्वार्थ भावना है।
फिर क्यों होती है लड़ाई?
इन सेवकों ने,
बना दिया है चुनाव को
महाभारत का कुरूक्षेत्र।
🖋_मनीभाई नवरत्न_

(2)
“राजा के सेवक हजार”
जो खाते हैं मेवा,
और रखते हैं जेब में सेवा।
उसे दिखाते हैं तभी
जब लेते हैं सेल्फी।
जो दिखता है दीवार पर
टीवी में, अखबार पर।
मीडियाकर्मी फेंके
जबरदस्त आर्कषण।
राजा को होता है
जिससे साक्षात् दर्शन।
ये तो वही देखता है ,
सुनता है, समझता है।
जो मंत्री चाहता है।
राजा में नहीं है
संजय सा दूरदृष्टि
वो तो धृतराष्ट्र है ।
🖋_मनीभाई नवरत्न_

(3)
राजा बड़ा रूखा है
लगता है कई दिनों से भूखा है।
और भूखे को सदा ,
पेट का सूझता है
वो जरा मान-सम्मान को,
कम बूझता है।
काम की तलाश में
सौ कोस दूर चलता है।
अधूरे सपने साथ ले,
चार आने पर बहलता है ।
अपने घर में
राज करने के बजाय
दासता झेल रहे बाहर ।
आज रास्ते बने हैं
इनके आसरे ।
जहाँ काटते अपना सफर।
🖋_मनीभाई नवरत्न_

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