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जब एक बच्चा- अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में जीवन में विभिन्न स्तर पर हो रहे सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन को दर्शाया गया है |
जब एक बच्चा – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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जब एक बच्चा – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

जब एक बच्चा
दुनिया में आता है तो
चारों तरफ लोग
चार होते हैं

जब एक बच्चा रोता है तो
उसे दुलार, प्यार व चुप कराने वाले
चार होते हैं

पकड़ चलता है
जब अंगुली
तो लोग आसपास
चार होते हैं

उठाकर बस्ता
वो जब जाता है स्कूल
तो आसपास घर के चार होते हैं

स्कूल ने भी
उसके मित्र
चार होते है

बड़ा होता है
जब वो यौवन कि
गली में
किसी से उसके नैन चार होते हैं
इन नैनों कि
गलियों सेव जब वह
गुजरता है तो
आसपास बच्चे चार होते हैं

सोता है जिस
चारपाई
पर वह
उसके पाए भी चार होते हैं

कन्धों पर
करता है जब वो अपने
जीवन की अंतिम सवारी
तो कंधे चार होते हैं

लिटाकर किया जाता है
जहां संस्कार
वहा पर भी कोने चार होते हैं

चार दिनों कि
जिंदगी की ये
कहानी
आदमी की जुबानी

हो सके तो
संभाल
इस जिंदगी को मतलब दे
अर्थ दे
उचित आराम दे
कर्म कर
संयम धर
मानव रह
मानवतापूर्ण
व्यवहार कर
मानव के कल्याण के
हित
विचार कर

जीवन संवार ले
चार दिन
जिंदगी के
अर्थपूर्ण गुजार दे
चार दिन
जिंदगी के
अर्थपूर्ण गुजार दे
चार दिन
जिंदगी के
अर्थपूर्ण गुजार दे

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