KAVITA BAHAR
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जीवन विद्या पर कविता

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जीवन विद्या पर कविता

जीवन रूपी विद्या, होती है सबसे अनमोल ।
जानके ये विद्या, तू जीवन के हर भेद खोल।।

आया कैसे इस दुनिया में , समझ तू कौन है?
इस प्रश्नों के उलझन में, “मनी “क्यों मौन है ?
समझ कर इस रहस्य को,जानो अपना रोल।
जानके ये विद्या को, तू जीवन के भेद खोल।।

स्वयं में हैं घुटन और,परिवार में होती टूटन ।
प्रकृति में प्रदूषण ,लाया समाज में विघटन।
फिर भी शिक्षित होने का पीट रहे हैं ढोल ।
जानके ये विद्या को, तू जीवन के भेद खोल।।

मान रहे मान्यता को , जानने से कोसों दूर ।
आखिर क्या भय तुझे ? जो इतना मजबूर ।
संप्रदाय को धर्म समझ,भूल गये मेलजोल ।
जानके ये विद्या को,तू जीवन के भेद खोल।।

पदार्थ,प्राण और युवा में , ज्ञान तेरी इकाई।
सूक्ष्म रूप में तो सब है ,आपस में भाई-भाई।
गोल परमाणु से बनी ,धरती की रचना गोल।
जानके ये विद्या को,तू जीवन के भेद खोल।।

जब जानेंगे हम जीवन हैं ,शरीर में वास करें।
फिजूल संग्रह को छोड़, प्रकृति विकास करें।
प्रकृति विनाशकर ,बोलते विकास के बोल ।
जानके ये विद्या को ,तू जीवन के भेद खोल।।

मूल्य समझें,चरित्र जानें,नैतिक व्यवहार रहे ।
जीने दें फिर जीयें ,ये जीवन और विचार रहे।
प्रकृति रक्षक हम , ना दे इसे जहर का घोल ।
जानके ये विद्या को , तू जीवन के भेद खोल।

मनीभाई नवरत्न

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