KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हिन्दी गीत: जीत होके भी मन निराश है- मनीभाई नवरत्न

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निकल पड़े हैं सफर में ,
मंजिल की ना तलाश है
जो हमसफ़र हो तुमसा
तो हर मंजिल पास है।।
फिर क्यों नाराज है, ….
क्यों उदास है….
इस पल में जीत होके भी
मन निराश है……

ख्वाहिशों की भूलभुलैया नगरी में
क्यों भटके हम जेठ दुपहरी में।।
सांसों का , क्या भरोसा जिन्दगी में?
ये कभी भी छोड़े दे ,दो घड़ी में।।
फिर क्यों जाऊँ ? तुम्हें छोड़के
जो नहीं यहाँ कोई, तुमसा खास है।।1।।
फिर क्यों नाराज है, ….
क्यों उदास है….
इस पल में जीत होके भी
मन निराश है……

तू जो कहती है आगे बढ़ मेरे लिये
नैनों से तुम कभी, गुम होना ना।
पीछे मुड़कर ,मैं जो कभी तुम्हें देखूँ
नैनों से नीर बहाते, तुम होना ना।
मेरी जिन्दगी अब हो चुकी तेरी
मुझे भी तेरी धड़कन का अहसास है।।2।।
फिर क्यों नाराज है, ….
क्यों उदास है….
इस पल में जीत होके भी
मन निराश है……

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