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जल संकट पर रचना

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जल संकट पर रचना

सरिता दूषित हो रही,
व्यथा जीव की अनकही,
संकट की भारी घड़ी।

नीर-स्रोत कम हो रहे,
कैसे खेती ये सहे,
आज समस्या ये बड़ी।

तरसै सब प्राणी नमी,
पानी की भारी कमी,
मुँह बाये है अब खड़ी।

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पर्यावरण उदास है,
वन का भारी ह्रास है,
भावी विपदा की झड़ी।

जल-संचय पर नीति नहिं,
इससे कुछ भी प्रीति नहिं,
सबको अपनी ही पड़ी।

चेते यदि हम अब नहीं,
ठौर हमें ना तब कहीं,
दुःखों की आगे कड़ी।

नहीं भरोसा अब करें,
जल-संरक्षण सब करें,
सरकारें सारी सड़ी।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया
29-05-19
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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