KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जो मेरे द्वारे तू आए

अशोक दीप

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जो मेरे द्वारे तू आए

प्राण मरुस्थल खिल-खिल जाए
साँस-डाल भी हिल-हिल गाए
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

जुड़े सभा सपनों की आकर
आंखों की सूनी जाजम पर
खेल न पाएँ बूँदें खारी
पलकों की अरुणिम चादर पर

चहल-पहल हो मेलों जैसी
गुमसुम अधरों पर गीतों की
फुल उदासी झड़े धूल-सी
खिले जवानी नभ दीपों-सी

उमर चाल छिपते सूरज-सी
घबराकर पीली पड़ जाए ।
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

शुष्क मरुस्थल-सी सूखी देह से
फूट पड़ें अमृत के धारे
दीपदान करने को दौड़ें
खुशियाँ मुझे जिया के द्वारे

संगीतमयी संध्या-सी हों
डूबी-सी धड़कन की रातें
मानस की चौपाई जैसे
महकें अलसायी-सी बातें

झरे मालती रोम-रोम से
कस्तूरी गंध बदन छाए
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

उतर चाँदनी नील गगन से
पूरे चौका मन आँगन में
चुनचुन मोती जड़ें रातभर
सितारे फकीरी दामन में

थपकी दे अरमान उनींदे
अंक सुलाए रजनीगंधा
भर-भर प्याली स्वपन सुधा की
चितवन से छलकाए चंपा

भोर भए पंछी-बिस्मिल्लाह
शहनाई ले रस बरसाए ।
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

अशोक दीप
जयपुर