KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

जूड़े का गुलाब

0 322

जूड़े का गुलाब

स्त्री और धरती
दोनों में से बहुत लोगों ने
सिर्फ स्त्रियों को चुना
और प्रेम के नाम पर
उनके पल्लू और जूड़ों में बँध गए;

प्रदूषणों का श्रृंगार किए
विधवा वेश सी विरहणी वसुधा
कराहती रही
तुम्हारी बेवफाई पर|

उसकी गोद में कभी जाओ
तो पाओगे
लाखों स्त्रियों के रिश्तों का प्यार एक साथ,
प्यार जब भी होता है तब–
बहारें खिलनी चाहिए,
संगीत के सोते फूटने चाहिए….;

कोई कभी भी नहीं चाहता कि–
कोई उसे बेवफा कहे
मजबूरियाँ आते–जाते रहती हैं|
प्यार जो एक बार लौटा
तो दुबारा नहीं लौटता,
ना ही मोल ले सकते
और ना ही बदल सकते;

इसलिए सँवारतें रहें
अपनी धरती को
अपने प्रेयसी की तरह|
कहीं कोई तो होगी
जो आपके खिलाए हुए गुलाब को
अपने जूड़े में खोंचने को कहेगी
उस दिन गमक उठेगी
धरती और आपका बागीचा
सुवासित हो जाएगा गुलाब,
स्त्रियाँ और वसुधा अलग कहाँ हैं?

रमेश कुमार सोनी LIG 24 कबीर नगर रायपुर छत्तीसगढ़ 7049355476

Leave a comment