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जंगल की आग – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से कवि जंगल में आग से होने वाली जन हानि , पर्यावरण एवं पशु हानि की ओर संकेत दे रहा है |
जंगल की आग – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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जंगल की आग – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

जंगल की आग देखकर
सिहर उठता हू मैं
सोचता हूँ उस सूक्ष्म जीव
का क्या हुआ होगा
जो अभी- अभी किसी अंडे से
बाहर आया होगा
आँखें अभी उसकी खुली भी नहीं
तन पर जिसके अभी ऊर्जा आई ही नहीं

जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।

शेर के उस छोटे से बच्चे का
अंत कितना भयावह रहा होगा
अभी तो उसने अपनी माँ के
दूध का आचमन भी न किया होगा
वह अपने भाई बहनों के साथ खेल भी ना सका
कि मौत के खेल ने अपना रंग दिखा दिया

जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।

उन छोटी – छोटी चीटियों की भी बात करें हम
टिक-टिक कर रेंगती यहाँ से वहाँ
क्या हुआ होगा इनका
अंडे इनके अपने बच्चों को इस धरती पर
बाहर भी न ला पाए होंगे
कि जंगल की आग ने इन्हें अपनी आगोश में ले लिया होगा

जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।

बात हम उनकी भी करें जंगल जिनका जीवन स्थल है
वे झोपड़ी बना जंगल पर आश्रित रहते हैं
रोज का भोजन रोज एकत्रित करने वाले ये जीव ये प्राणी
क्या इन्हें बाहर भागकर आने का मौक़ा मिला होगा
या चारों और फैलती भयावह आग ने इन्हें निगल लिया होगा

जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।

ये जंगल की आग केवल जंगल की आग ही नहीं
वरन समाज में फ़ैली कुरीतियों की ओर भी संकेत देती हैं
दंगा , आतंकवाद भी समाज में जंगल की आग की तरह
सब कुछ नष्ट कर मानव जीवन को बेहाल करती है
क्षेत्रीयतावाद, जातिवाद, धर्मवाद आज भी
जंगल में आग की तरह हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे
ये आग देखकर सिहर उठता हूँ मैं
इस आग में जलते मानव को, झुलसते मानव को
देख रो पड़ता हूँ मैं रो पड़ता हूँ मैं

जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।
जंगल की आग देखकर सिहर उठता हू मैं।

– अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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