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कहानी मोड़ मन मानस

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नवगीत- कहानी मोड़ मन मानस

कहानी मोड़ मन मानस
उदासी छोड़नी होगी।
पिपासा पीर विश्वासी
निराशा भूल मन योगी।।

गरीबी की नहीं गिनती
दुखों का जब पहाड़ा हो
नही बेघर नदी समझो
किनारा तल अखाड़ा ।
वृथा भटको नहीं बादल
विरह पथ दर्द संयोगी।,।

उजाले भूल मन चातक
अँधेरे सिंधु से ले लो
बहे सावन दृगों से ही
अकालों का यजन झेलो
बहे गंगा कठौती में
किसानी श्वेद श्रम भोगी।

बनाले मीत वर्णों को
लिखो हर पीर परिजन सी
बसे परिवार छंदों के
सृजन कविता प्रिया तन स
वियोगी घन उठो बन कर
सृजन संगीत संभोगी।।

नदी की धार सम पर्वत
पराई पीर हरनी है
समंदर प्रीति का खाली
जगत की गंद भरना ।
तपन से भाप बन उड़ना
बरसना खूब घन जोगी।।

दुखों के ताल रीते कर
तलाई बो मिताई की
नहर बाँधों नदी नालों
सनेही मन सिँचाई की ।
मिटा अक्षर अभावों के
सँभलना आज मन रोग।।


✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन, सिकंदरा,
दौसा,राजस्थान ९७८२९२४४७९

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