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कलम चले कालचक्र सी – बाबू लाल शर्मा

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कलम चले कालचक्र सी



. (१६मात्रिक)
कलम चले यह कालचक्र सी,
लिखती नई इबारत सारी।
इतिहासों को कब भूलें है,
लिखना देव इबादत जारी।

घड़ी सुई या चलित लेखनी,
पहिया कालचक्र अविनाशी।
चलते लिखते घूम घूम कर,
वर्तमान- आगे – इतिहासी।

मिटते नहीं कलम के लेखे,
जैसे विधना लेख अटल है।
हम तो बस कठपुतली जैसे,
नाचे नश्वर जगत पटल है।

शक्ति लेखनी जग पहचाने,
क्रांति कथानक,सत्ताधारी।
गोली , तोप, तीर , तलवारे,
बारूदी सत्ता से भारी।

कलमकार सिर कलम हुए है,
जब जब सत्ताधीशों से।
नई क्रांति से कलम मिलाती,
कुचली सत्ता नर शीशो से।

कूँची कलमशक्ति हथिया के,
नई व्यवस्था सत्ता करती।
कलमवीर सिरकलमी न हो,
ऐसी सोच व्यवस्था करती।

कलम रचाती क्रांति नवेली
नवाचार हर क्षेत्र करेगी।
पौधे कलम नस्ल बीजों से,
हरित क्रांति कर खेत बरेगी।

सत्य छाँटती, सतत लेखनी,
ज्यों दर्पण को कलम काटती।
सामाजिक सद्भाव पिरो कर,
ऊँच नीच मतभेद पाटती।
……
कलम अजर है कलम अमर है
कलम विजय है सर्व समर में।
कलमकार तन वस्त्र बदलते,
कलम बचे जग ढहे सगर में।

वेदों से ले संविधान तक,
रामायण ईसा कुरान तक।
कलम कालगति चलते रहती,
सृष्टिसृजन से प्रलयगान तक।
… ……..

बाबू लाल शर्मा

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