हाय! कलम क्यों थककर बैठी – विनोद कुमार चौहान जोगी

हाय! कलम क्यों थककर बैठी?

ध्येय अधूरा है फिर भी तुम, कैसे करती हो विश्राम?
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?

नहीं मरी भूखमरी भू की, विपन्नता भी हुई न दूर।
शिक्षा से वंचित हैं बच्चे, धन अर्जन को हैं मजबूर।।
रहें अभावों में जीते सब, संसाधन भी हुए अनाम।
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?

सुख का सूरज छुपकर बैठा, दुख के बादल लेते घेर।
भटक रही है जनता दर-दर, अंधा-बहरा बैठा शेर।।
काज सफल भी होता तब ही, जब जेबों में होते दाम।
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?

युवा घूमते बेगारी में, धन अर्जन का ढूंढ़े स्रोत।
रद्दी होती डिग्री सारी, प्यारी लगती उनको मौत।।
गलत राह में भटक रहे हैं, जाने क्या होगा परिणाम?
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?

अब भी घर में घर का भेदी, खोले जग में घर का भेद।
दृश्य महाभारत का अब भी, देख हृदय में होता खेद।।
द्वेष-क्लेश है मानव मन में, प्रेम भाव पर पूर्ण विराम।
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?

शपथ लिया था तुमने ही तो, संचारित हो शुभ संदेश।
हरें जगत से कुरीतियों को, सुखमय हो जग में परिवेश।।
धीरे-धीरे होती देखो, मानवता का काम तमाम।
हाय! कलम क्यों थककर बैठी? भूल गई क्या अपना काम?



*विनोद कुमार चौहान “जोगी”*
*जोगीडीपा, सरायपाली*

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