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कवि हूँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता के माध्यम से कवि अपनी रचनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी चाहता है और सामाजिक बुराइयों को समाप्त करना चाहता है |
कवि हूँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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कवि हूँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

करोगे वाहवाही कविताओं की झड़ी लगा दूंगा
डूबते बीच मझदार को पार लगा दूंगा

कविता करना मेरा कोई सजा नहीं है
बुराइयों से बचाकर तुझे सजा पार करा दूंगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

कविता की ताकत को तुम क्या जानो
तुमने किया सजदा तो सर कटा दूंगा
उठाई जो तलवार तुमने प्रेम का पाठ पढ़ा दूंगा
की जो प्रेम की बातें सीने से लगा लूँगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

प्रकृति मेरा प्रिय विषय रही है
हो सका तो चारों और फूल खिला दूंगा
सुंदरता की तारीफ की बातें न पूछो मुझसे
हो सका तो इसे नायाब चीज बना दूंगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

जीता हूँ में समाज की बुराइयों में
लिखता हूँ कवितायें तनहाइयों में
अपराध बोध बुराइयों पर कर प्रहार
एक सभ्य समाज का निर्माण करा दूंगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

सभ्यताओं ने किया कवि दिल पर प्रहार
दिए नए नए जख्म नए नए विचार
विचारों की इन नई श्रंखला में भी
जीवन अलंकार करा दूंगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

कवि हमेशा जिया है दूसरों के लिए
कवि हमेशा लिखता है समाज के लिए
दिल से बरबस आवाज ये निकलती है
हे मानव जीवन तुम सब पर वार कर दूंगा

कवि हूँ कवि की गरिमा को पहचानो

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