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कवि का धर्म निभाना है

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कवि का धर्म निभाना है


. ककुभ छंद
. (१६,१४…… चरणांत.२२)

नव उम्मीदें,नया आसमां,
यही विकासी सपना है।
जागृत हुआ गौर से देखा,
सारा भारत अपना है।


साहित्यिक सेवा भी करनी ,
सत्य विरासत होती है।
नव उम्मीद..रूपमाला के,
हम तुम सच्चे मोती हैं।

हर मोती की कीमत होती,
सच ही यह सच्चाई है।
सब मिल जाते माला बनती,
अच्छी यह अच्छाई है।

बनकर अच्छे मीत प्रलेखूँ
सुन्दर माला का मोती।
जन गण मन की पीर लिखूँ जो,
भारत माता को होती।

नव उम्मीदें,नया आसमां,
तब नव आयाम रचेंगे।
काव्य कलम मुखरित हो जाए,
फिर नव साहित्य सजेंगे।।

नव उम्मीदें, नया आसमां,
सुधिजन रचनाकारों का।
सबके सब मिलके कर देंगे,
युग को नव आकारों का।

चाहे जितनी बाधा आए,
कवि का धर्म निभाना है।
नई सोच से नव उम्मीदें,
नव पथ भी दिखलाना है।

मुक्त परिंदे बन के हम तो,
नित फिर आसमान नापें।
नव उम्मीद भरेंगें मिलकर,
बाधाओं से क्या काँपें।

निज नीड़ों को क्यों भूलें हम,
भारत की संस्कृतियों को।
पश्चिम की आँधी को रोकें
मिलकर सब विकृतियों को।

हिन्दी के हित नव उम्मीदें,
देश,धरा मानवता की।
नया आसमां हम विचरेंगे,
कविता गाने सविता की।।

बाबू लाल शर्मा “बौहरा” विज्ञ

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