KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कविता गुण की खान है

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कविता गुण की खान है

कविता गुण की खान है ,
दिव्य सृजन संसार ।
नवरस को है धारती ,
कवि मन रसिक अपार ।।

लिखना कविता रोज ही ,
हो लेखन विस्तार ।
पढ़कर पाठक मुग्ध हो ,
करे ज्ञान संचार ।।

विषय भाव अनुरूप ही ,
लिखना सदा प्रगीत ।
शिल्प कला से गढ़ चलो ,
बने काव्य जग प्रीत ।।

कविता के संसार में ,
नकली कवि भरमार ।
कविता की चोरी करे ,
उनके घट छल द्वार ।।

शब्द – शब्द को गूँथ लो ,
पुष्प लगे सम हार ।
कहे रमा ये सर्वदा ,
सृजन धर्म जग सार ।।

*~ मनोरमा चन्द्रा "रमा"* *रायपुर (छ.ग.)*