KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कविता की पौष्टिकता

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कविता की पौष्टिकता – 19.04.21


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खाना बनाना बड़ा कठिन काम होता है
खाना बनाने के वक्त बहुत सारी बातों का ध्यान रखना पड़ता है एक साथ

कितने चावल में कितना पानी डालना है
कौन कौन से मसाले कब कब डालना है
चूल्हे में मध्यम, कम या तेज़ आँच कब कब करना है
कुकर में बज रहे सीटी का अर्थ कब क्या समझना है
ऐसे ही बहुत सारे सवाल खड़े होते रहते हैं

आप लगातार कोशिश करके इतना ठीकठाक खाना बना ही सकते हैं कि खुद खा सको

सतर्कता न होने या लगन की कमी होने पर
बर्तन के नीचे से कई कई बार भात चिपक जाता है
कई कई बार जल जाती है सब्ज़ी या दाल

किसी ख़ास ट्रेनिंग की मदद से
आप ला सकते हैं अपने व्यजंनों में विविधता
और बदल या बढ़ा सकते हैं अपने खाने का ज़ायका

लाख हुनर होने के बावजूद
अच्छा खाना बनाने के लिए
ज़रूरी होता है नियमित अभ्यास

अक़्सर खाने वालों में हंगामे खड़े हो जाते हैं
खाने में नमक या मिर्च ज़रूरत से ज़्यादा होने पर

मुझे लगता है जितना कठिन होता है
रसोइये के लिए सुस्वादु और पौष्टिक खाना बनाना
उससे कहीं ज़्यादा कठिन और जोख़िम भरा होता है
कवि के लिए कविता लिखना

कठिन होता है कविता में
चुन चुनकर एक एक शब्दों को रखना
अर्थों को भावनाओं की आँच पर पकाना
पकी पुकाई कविता को बड़ी निष्ठा के साथ लोगों को परोसना
और सबसे कठिन होता है कविता में कविता की पौष्टिकता को बनाए रखना।

— नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

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