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शीशपटल पर रहता हूँ-कवियों की आपाबीती पर कविता

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शीशपटल पर रहता हूँ-कवियों की आपाबीती पर कविता


. (१६,१४)

शीश महल की बात पुरानी,
रजवाड़ी किस्से जाने।
हम भी शहंशाह है, भैया,
शीश पटल के दीवाने।

आभासी रिश्तों के कायल,
कविताई के मस्ताने।
कर्म विमुख साधो सा जीवन,
अरु व्याकरणी पैमाने।

कुछ तो नभमंडल से तारे,
कुछ मुझ जैसे घसि यारे।
काम छोड़ कविताई करते,
दुखी भये सब घर वारे।

मैं भी शीश पटल सत संगी,
तुम भी हो साथ सयाने।
पंख हीन बिन दीपक जलते,
हम बिन मौसम परवाने।

सुप्रभात से शुभ रात्रि तक,
शीशपटल पर रहता हूँ।
घरवाली दिन भर दे ताने,
बिन जाने ही सहता हूँ।

नदिया, मे बुँदिया की जैसे,
स्वप्न लोक में बहता हूँ।
मनोभाव ऐसे रहते ज्यों,
शीश महल मे हीे रहता हूँ।

एक पटल पर भी रह लेता,
अन्य पटल भी मँडराता।
संदेशे पढ़ पढ़ कर मै, तो,
भँवरे सा नित भरमाता।

चैन पटल बिन नहीं मिले तो,
पटलों पर बेचैन रहूँ।
नैन पटल में क्या क्या खोजे,
लगता घर बिन नैन रहूँ।

कैसे, अनुपम रिश्ते जोड़े,
आभासी प्रतिबिंबो से।
धरा धरातल भूल रहें,हम,
दूर रहे सत बिम्बो से।

जीवन ही आभास मात्र अब,
शीश पटल आचरणों में।
जैसे शहंशाह रमते थे,
शीश महल सत वरणों में।

मूल भूत, अन्तर पहचाना,
कैसा, यह परिहास हुआ।
वो, तो शीश महल के स्वामी,
पटलों का मैं दास हुआ।
. ______
बाबू लाल शर्मा “बौहरा

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