KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

खिली गुनगुनी धूप

प्रातःकाल की छंटा बिखेरती कविता

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खिली गुनगुनी धूप

 

खिली गुनगुनी धूप, खिल गई अलसाई सी धरती |

है निसर्ग की माया ये, ऋतुओं ने सृष्टि भर दी |

लगे चहकने सभी पखेरू, भरने लगे उड़ान,

लगे महकने सभी प्रसून, महकी हर मुस्कान,

तितली के पंखों ने दुनिया,

रंग-बिरंगी कर दी |

खिली गुनगुनी धूप, खिल गई अलसाई सी धरती |

पतझर का मौसम बीता, आया अब मधुमास

कलियों ने आँखें खोली, मधुप की जागी प्यास

छत की सभी मुंडेरों पर आकर,

अठखेली सी करती |

खिली गुनगुनी धूप, खिल गई अलसाई सी धरती |

मैंने भी अंजुरी में भर ली, आज गुनगुनी धूप,

आस-पास का सब अँधियारा, डाल दिया है कूप,

मन वीणा के तारों में,

इक झंकार सी भरती |

खिली गुनगुनी धूप, खिल गई अलसाई सी धरती |

उमा विश्वकर्मा , कानपुर, उत्तरप्रदेश