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खुजली- मनीभाई नवरत्न (हिन्दी कविता)

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खुजली- मनीभाई नवरत्न

(1)

मैं खोजता हूं
कहां है मुझे खुजली ?
मैं खुजाता रहता हूं ।
कभी हाथ पैर, तो कभी सिर।
इसका मतलब यह कतई नहीं कि
मुझे खुजली है या नहीं ।
पर जब जब बैठता हूं
निठल्ले भाव से।
मैं खुजाता रहता हूं
खोजता रहता हूं
कहां है मुझे खुजली?
हां! मुझे पता है
खुजाना ही खुजली का निदान है।
तभी तो अनवरत जारी है मेरे प्रयोग ।
लेकिन मैं अब भी अनजान
न जान पाया
मेरे खुजली का स्थान।
है इसलिए अब भी  बाकी
मेरी तकलीफ, मेरी खुजली।

(2)

अब मैं संभल गया हूं
खुजली से पहले ।
खोजता हूं कहां है खुजली?
क्यों है खुजली ?
जानने लगा हूं
खुजाना ही नहीं एकमात्र निदान ।
कई बार बिना समझे
कर जाना उपाय
समाधान के बजाय
बन जाती है नई समस्या ।
जो धारण कर लेती है
अपना विकराल रूप।
अब ठहरता हूं
जाया नहीं करता प्रयास।
सही स्थान पर हमारी एक खरोच ही
काफी है खुजली को छूमंतर करने के लिए।।

मनीभाई नवरत्न

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