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कमी नहीं है हौसले  

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कमी नहीं है हौसले
    

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कम भी नहीं है हौसले गिर भी पड़ी तो क्या हुआ।
है जिन्दगी के सामने बाधा खड़ी तो क्या हुआ ।।
चल दूँ जिधर खुद रास्ता मिलता मुझे ही जाएगा।
टूटी अगर रिश्तों की’ इक नाजुक कड़ी तो क्या हुआ।।
मैं ढूँढ लूँगी राह को अपना हुनर मैं जानती।
वो साथ दे या बाँध ही दे हथकड़ी तो क्या हुआ।।
सर पे बिठा रक्खा था मैंने बेवफा को आज तक।
सारी हदों को तोड़कर मैं ही लड़ी तो क्या हुआ।।
जब गीत सारे प्यार के मुरझा गये सहराहों में।
फिर बारिशों की लग पड़ी रोती झड़ी तो क्या हुआ।
इक भूल ने ही जिन्दगी जीना हमें सिखला दिया।
गर वक्त की चोटें हमें खानी पड़ी तो क्या हुआ।।
ताकत यही मैं टूटकर बिखरी नहीं हूँ आज तक।
आराम की आई नहीं अब तक घड़ी तो क्या हुआ।।

डॉ. सुचिता अग्रवाल”सुचिसंदीप”
तिनसुकिया, असम
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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