KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

तो मैं क्या करूँ ?

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तो मैं क्या करूँ ?

आज आसमाँ भी रोया मेरे हाल पर
और अश्कों से दामन भिगोता रहा,
वो तो पहलू से दिल मेरा लेकर गये
और मुड़कर न देखा तो मैं क्या करूँ ?


उनकी यादें छमाछम बरसती रहीं
मन के आंगन को मेरे भिगोती रहीं
खून बनकर गिरे अश्क रुख़सार पर,
कोई पोंछे न आकर तो मैं क्या करूँ ?


में तो शम्मा की मानिंद जलती रही,
रात हो ,दिन हो, याके हो शामों सहर,
जो पतंगा लिपटकर जला था कभी,
चोट खाई उसी से तो मैं क्या करूँ ?


जब भी शाखों से पत्ते गिरे टूट कर
मैने देखा उन्हें हैं सिसकते हुए,
यूँ बिछुड़ करके मिलना है सम्भव नहीँ,
हैं बहते अश्कों के धारें तो मैं क्या करूँ ?

जिनको पूजा है सर को झुका कर अभी ।
वो तो सड़कों के पत्थर रहे उम्र भर,
बाद मरने की पूजा हैं करते यहाँ
है ये रीत पुरानी तो मैं क्या करूँ ?


वो मेरी मैय्यत में आये बड़ी देर से
और अश्कों से दामन भिगोते रहे
जीते जी तो पलट कर न देखा कभी,
वो बाद मरने के आये तो मैं क्या करूँ ?


सुलोचना परमार “उत्तराँचली”

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