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माँ की वह आँख पर कविता

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माँ की वह आँख पर कविता

जब मैंने सुना कि माँ की एक आँख की रोशनी चली गई है
सहसा जैसे रोशनी से मेरी यक़ीन ही उठ गई
मैंने खुद को ज़ोर से झिंझोड़ा
क्या सचमुच वही रोशनी चली गई
जो मुझे और पूरे परिवार को किया करती थी रोशन
क्या सचमुच वही आँख जो मेरी भी आँख थी

आँखे बिना रोशनी की आँखे नहीं हो सकती
जैसे आग बिना ताप के आग नहीं हो सकती
जैसे सूरज बिना प्रकाश के सूरज नहीं हो सकता

कितना प्यार,कितनी ममता, कितनी दया,

कितनी करुणा,कितनी प्यास,

कितनी प्रतीक्षा और कितनी उम्मीदें
रही होगी उस आँख में
अचानक बेपनाह हो गए होंगे ये सारे भाव
जैसे आत्मा के साथ छोड़ देने से बेपनाह हो जाती है देह

वो आँख जिससे माँ ख़ुद को सँवारती रही होगी
वो आँख कभी अपनी सुंदरता पर
मेरे पिता से न जाने कितनी तारीफ़ें लूटी होगी
वो आँख जो अपनों को बहुत दिन बाद देखकर
बड़ी प्रसन्न होती रही होगी
वो आँख न जाने कितनी बार
कभी खुशियों में कभी दुखों में बहाई होगी आँसू
वो आँख जिसकी रोशनी का अंश मुझे भी मिला है
वो आँख जो निराशा के दीये में आशा की रोशनी भर देती थी
वो आँख जो जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव में समंजित हो जाया करती थी

हाँ सचमुच वही आँख एक दिन अचानक
घुप्प अंधियारे से भर गई
जैसे भर जाती है दुनियां अंधेरे से
एकाएक खग्रास सूर्यग्रहण लगने के बाद ।

–नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

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