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माँ की याद में- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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माँ की याद में- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

meri maa
meri maa

सारा घर
घर के सारे कमरे
अंदर-बाहर सब
खुशबुओं से लिपटा रहता था
तुम्हारे जाने के बाद
बाग है वीरान-सा
खुशबू सब चली गई 
तुम खुशबू थी माँ ।

    2
आंगन के एक कोने पर
तुम चावल से कंकड़ निमारती
तुम्हारे पास ही बाबूजी
पुस्तक लिए कुछ पढ़ रहे होते थे

आंगन के उस कोने पर
बाबूजी आज भी पढ़ते हैं
तुम चली गई
सूपे में रखा है चावल

खाने में जब-जब कंकड़ आता है
तुम याद आती हो माँ ।

      3
तुम्हें सोने के जेवरों से बेहद प्यार था
मेरे सामने ही तुम्हारे देह से
सारे जेवर उतारे जा रहे थे
तुम चुप क्यों थी ?
मना क्यों नहीं की माँ ?

    4
भाई-बहनों में तीसरा हूँ
सबसे छोटा नहीं
फिर भी मुझे 
पूरे घर में ‘छोटू’ कहा जाता है
काश मैं बड़ा होता
पहले पैदा हुआ होता
तुम्हारा साथ मुझे ज्यादा मिला होता माँ ।

    5
तेरह साल बाद दशहरे में आया था गांव
इस बार भाइयों में कोई नहीं थे
अकेला ही था माँ के पास 

दशहरे की शाम 
पीढ़े पर खड़ाकर
दही का तिलक लगाकर
तूने उतारी थी मेरी आरती
विजय पर्व पर 
छुए थे मैंने तुम्हारे पांव
विजय का दी थी आशीर्वाद
और पाँच सौ के दो नोट

न तुम्हें पता था
न मुझे पता था
कि दशहरे के तीसरे दिन 
तुम चली जाओगी

तुम चली गई
पर विजय कामना और असीस रूप में
साथ रहती हो हमेशा माँ ।

    6
तुम्हारे मृत देह को
चूमा था कई बार
तुम निस्पंद थी

घर के पास 
बाड़ी के पीछे
खेत के मेढ़ पर
अग्नि दी गई थी तुम्हें

तुम राख हो चुकी थी
तीसरे दिन राख के ढेर से
तुम्हारी अस्थियों को बीना था
भीतर भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था
बह रहे थे आँसू मेरे
विश्वास नहीं हो रहा था
कि तुम नहीं हो अब

विश्वास तो अब भी नहीं होता
याद कर उस दिन को
आँखे अब भी भर आती है

जब भी जाता हूँ घर
मेरे कदम ख़ुद ब ख़ुद
चल पड़ते हैं उस जगह
जहां तुम्हारी चिता बनाई गई थी
जहां अग्नि दी गई थी तुम्हें
वहां खड़ा होकर तुम्हें याद करना
तुम्हें महसूस करना अच्छा लगता है माँ ।

– नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
      9755852479

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