KAVITA BAHAR
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बाबा कल्पनेश के मां विषय पर दोहे

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बाबा कल्पनेश के मां विषय पर दोहे


माता सम दाता नहीं,यह अनुभव कर गान।
मन अति व्याकुल हो रहा,मौन अधर धर ध्यान।।

तन-मन-धन सब कुछ दिया,सूरज चंदा दान।
खुला गगन सिर पर दिया,भर ले जीव उड़ान।।

पिता छाँव सिर पर दिया,आँचल छाँव महान।
दूध पिला कर तृप्ति दी,कर ले जीव गुमान।।

हाथ पकड़कर दी डगर,कदम-कदम का दान।
संत-तीर्थ सेवा दिया,कर जीवन कल्यान।।

जीव उसी का अंश यह,करे उसी का गान।
खुशी-खुशी बाँटे सकल,खुशियाँ मिले महान।।

जो भी जग में प्राप्त है,माँ का ही वह दान।
माँ के चरणों में धरूँ,संकोची लघु मान।।

माँ का ऋण तो ऋण नहीं,माता कुल है मान।
माँ आँचल में सिर छिपा,माँ ऋण को पहचान।।

उर में माता प्रेम भर,नित-प्रति माँ से मांग।
कल्पनेश तू त्याग दे,उऋण रहे का स्वांग।।

कौन उऋण माँ से हुआ,मन में करो विचार।
गिरा भवानी का यही,सुन मन रे उद्गार।।

नेक पंथ पर पाँव धर,चल आगे ही देख।
माँ को खुशियाँ तब मिले,लख सुत खींची रेख।।

हृदय फूल महुआ बने,मिष्टी भरे मिठास।
माँ अधरों पर तब मिले,मधुर-मधुर नित हास।।

हृदय फैल पृथ्वी बने,निज लालन को देख।
माँ के मन में तोष हो,शास्त्र करें उल्लेख।।

शिव निज मानस में रचें,करें चरित का गान।
सुन-सुन सारा जग लखे,जग में होत विहान।।



बाबा कल्पनेश

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1 Comment
  1. बाबू लाल शर्मा बौहरा says

    परम पूज्य बाबा कल्पनेश जी का हिंदी साहित्य हित योगदान अनुकरणीय है
    आप इसी भाँति हिंदी साहित्य हित सृजनशील मार्गदर्शक बने रहें.
    स्नेहाशीष रखें
    सादर नमन