माँ सी हो गई हूँ

माँ सी हो गई हूँ


जब भी चादर बदलती
माँ पर झल्ला पड़ती
    ये क्या है माँ?
सारा सामान तकिए के नीचे
सिरहाने में,
कितना समान हटाऊँ
चादर बिछाने में!
बिस्तर का एक पूरा कोना
जैसे हो स्टोर बना,
माँ उत्तर देती
बेटा उमर के साथ याददाश्त कमजोर हो गई है
क्या कहाँ रखा भूल जाती हूँ,
इसलिए सिरहाने रख लेती हूँ!
थोड़ी खीझ होती
पर मैं चुप रहती,
धार्मिक किताबों के बिखरे पन्ने,
जपने वाली माला,दवाइयाँ
सुई-डोरा,उन स्लाइयाँ,
डॉ. की पर्ची,उनके नम्बर से भरी डायरी,
चश्मे का खोल,ईसब घोल,
पिताजी की तस्वीर,
हाय रे माँ की जागीर!
कुछ मुड़े-तुड़े नोट,
अखबारों की कतरने,
चमत्कारी भभूति की पुड़िया
और तो और,
ब्याही गई नवासी की
बचपन की गुड़िया!
आज मैं भी
माँ सी हो गई हूँ!
उनकी बूढ़ी,नीली सी आँखें
मेरी आँखों में समाई है,
भले ही चेहरे की झुर्रियाँ,
मेरी सूरत पर उतर नहीं पाई हैं
बालों की चांदी पर,
मेहंदी रंग लाई है,
मोटे फ्रेम के गोल चश्में की जगह,
पावरफुल लेंस है,
चलती नहीं लाठी टेककर
मगर घुटने नहीं दर्द से बेअसर!
सिरहाने रखे सामान थोड़े कम हैं,
ढेरों दवाईयाँ नहीं,
सुई -डोरा,ऊन स्लाइयाँ नहीं,
नहीं दर्दनिवारक तेल
स्प्रे है या जैल!
बाकी सारे सामानों की जगह
सिर्फ एक मोबाइल है,
समय बदल गया है न
नई-नई टेक्नोलॉजी आई है!
नहीं रखती माँ की तरह
चमत्कारी भभूति की पुड़िया,
लेकिन है ब्याही बेटी के
बचपन की गुड़िया!
आईना देखूँ तो सोचूँ
कैसी हो गई हूँ मैं,
क्या सचमुच
माँ सी हो गई हूँ मैं…..
—डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’
अम्बिकापुर,(छ. ग.)
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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