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माँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस कविता के माध्यम से कवि “माँ” शब्द को चरितार्थ करने की कोशिश कर रहा है | माँ के त्याग की भावना को भी इस कविता के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है |
माँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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माँ – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

माँ तेरे आँचल का
आश्रय पाकर
धन्य हो गया हूँ मै
माँ तेरी
कर्मपूर्ण जिंदगी
के पालने में
पलकर

कर्तव्यपूर्ण
जिंदगी का
प्रसाद पाकर
धन्य हो गया
हूँ मै

माँ तेरी आँखों में
स्नेहपूर्ण व्यवहार
अपने बच्चों के लिए
उमड़ता प्यार
देखकर
धन्य हो गया हूँ मै

माँ अपने
बच्चों के भविष्य
के प्रति
तेरे चहरे पर
समय समय पर
उभरती चिंता की लकीरें
साथ ही
तेरा आत्मविश्वास
देख धन्य हो गया हूँ मै

माँ
जीवनदायिनी के
साथ-साथ
प्रेरणादायिनी
प्रेमदायिनी
समर्पणरुपी
मूर्ति के साथ- साथ
आत्म बल से परिपूर्ण
शक्ति से संपन्न
ओजस
सभ्य

सुसंस्कृत
भविष्य
का निर्माण
करती

सांस्कृतिक
धरोहर

परम्पराओं का
निर्वहन करती
पुण्यमूर्ति को पाकर
धन्य हो गया हूँ मै

माँ
बच्चों को
बड़ों का सम्मान सिखाती
शिक्षकों के प्रति
आस्था जगाती
देवी को पाकर
धन्य हो गया हूँ मै

देखे थे मैंने
समय असमय
तेरी आँखों में आंसू
पर तेरा
विचलित न होना
प्रेरित करता है

मुझे शक्ति देता है
ऊर्जा देता है
विषम परिस्थितियों
में भी जीवन
जीने की कला
जो तूने सिखाई है
माँ
तुझे पाकर
धन्य हो गया हूँ मै

माँ
तुझे पाकर
धन्य हो गया हूँ मै
माँ
तुझे पाकर
धन्य हो गया हूँ मै

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