KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

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माँ,..माँ,.महकाएँ

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 *माँ,..माँ,.महकाएँ* 
. 路‍♀ *लावणी छंद* 路‍♀
.              
दिव्य जनों के,देव लोक से,
कैसे,नाम भुलाएँगे।
कैसे बन्धुः इन्द्रधनुष के
प्यारे रंग चुराएँगे।
सिंधु,पिण्ड,नभ,हरि,मानव भी
उऋण कभी हो पाएँगें?
माँ के प्रतिरूपों का बोलो,
कैसे कर्ज चुकाएँगे।
माँ को अर्पित और समर्पित,
अक्षर,शब्द सहेजे है।
उठी लेखनी मेरे कर से,
भाव *मातु* ने भेजे है।
पश्चिम की आँधी में अपना,
निर्मल मन, क्यों बहकाएँ।
आज नया संकल्प करें हम,
*माँ* की ऋजुता महकाएँ।

*मात्* प्रकृति ब्रह्माण्ड सुसृष्टा,
कुल संचालन करती है।
सूरज,चन्द्र,नक्षत्र,सितारे,
ग्रह,उप ग्रह,सब सरती है।
जग माता का रक्षण वंदन,
पर्यावरण सुरक्षा हो।
ब्रह्माण्ड संतुलन बना रहे,
निज मन में यह इच्छा हों।
माता प्राकृत,माता जननी,
सृष्टि क्रम सदैव चलाए।
आज नया संकल्प करे हम,
*माँ*, की समता महकाएँ।

*माँ* धरती सहती विपुल भार,
तन पर धारण करती है।
अन,धन,जल,थल,जड़ चेतन के,
सम् पालन जो करती है।
इस धरती का संरक्षण तो,
अपनी जिम्मेदारी हो।
विश्व *सुमाता* पृथ्वी रक्षण,
महती सोच हमारी हो।
माँ,वसुधा सम् अपनी माता,
माँ का श्रृंगार न जाए।
आज नया संकल्प करें हम,
*माँ*, की क्षमता महकाएँ।

*मात* भारती,स्वयं देश की,
आरती नित्य उतारती।
निज संतति के सृजन कर्म से,
सर्व सौभाग्य सँवारती।
माँ, बलिवेदी प्रज्वल्य रहे,
बस इतना अरमान रहे।
दुष्ट जनों के आतंको से,
मुक्त रहे *माँ* ध्यान रहे।
भारत माता सी निज माता,
माँ के हित शीश नवाएं।
आज नया संकल्प करे हम,
*माँ* की ममता महकाएँ।

*मात्* शारदे सबको वर दे,
तम हर ज्योति विज्ञान दें।
शिक्षा से ही जीवन सुधरे,
वे संस्कार सम्मान दे।
चले लेखनी सतत हमारी,
ब्रह्मसुता अभिनंंदन में।
सैनिक,कृषक,श्रमिक,माता,के,
मानवता के वंदन में।
उठा लेखनी, ऐसा रच दें,
सारे काज सँवर जाए।
आज नया संकल्प करें हम,
*माँ* की शिक्षा महकाएँ।

*माँ* जननी है हर दुख हरनी,
प्राणों का जो सृजन करे।
सर्व समर्पित करती हम पर,
निज श्वाँसों से श्वाँस भरे।
माँ के हाथों की रोटी का,
रस स्वादन पकवान परे।
माँ की बड़ बड़ वाली लोरी,
सप्त स्वरों से तान परे।
माँ का आँचल स्वर्गिक सुन्दर,
कैसे गौरव गान करें।
माँ के चरणों में जन्नत है,
क्या,क्या हम गुणगान करें।
माँ की ममता मान सरोवर,
सप्तधाम सेवा फल है।
माँ का तप हिमगिरि से ऊँचा,
हम भी उस तप के बल है।
माँ की सारी बाते लिख दे
किस की वह औकात अरे।
वसुन्धरा को कागज करले,
सागर यदि मसिपात्र करे।
और लेखनी छोटी पड़ती,
सब वृक्षों को कलम करे।
राम,खुदा,सत संत,पीर,जन,
माँ के चरणों नमन करे।
उस माँ का सम्मान करें हम,
वह भी शुभफल को पाए।
सोच समर्पण की रखले तो,
वृद्धाश्रम  *माँ* क्यों जाए।
मातृशक्ति जन की जननी है,
बात समझ यह आ जाए।
आज नया संकल्प करें हम,
*माँ* की सत्ता  महकाएँ।

*गौमाता* है खान गुणों की,
भारत में सनमानी है।
युगों युगों से महिमा इसकी,
जन गण मन ने मानी है।
भौतिकता की चकाचौंध में,
गौ,कुपोषित हो न जाएँ।
अल्प श्रमी हम बने अगर तो,
गौ कशी, हरकत न आए।
निज माता सम् गौ माता हो,
भाव भक्तिमय बन पाए।
आज नया संकल्प करे हम,
*माँ* की शुचिता महकाएँ ।

*माँ* गंगा,माँ यमुना,नर्मद,
कावेरी सी सरिताएँ।
वसुधा का श्रृंगार करें ये,
लगे खेत ज्यों वनिताएँ।
इनका भी सम्मान करें ये,
तृषिता कभी न हो पाएँ।
सब पापों को हरने वाली,
*माँ*  न प्रदूषित हो जाएँ।
सरिताएँ अरु माता निर्मल,
निर्मल मन साज सजाएँ।
आज नया संकल्प करें हम,
*माँ* पावनता महकाएँ।
        
मैने शब्द सुमन चुन चुन के,
शब्दमाल में गिन जोड़े।
भाव,सुगंध वीणापाणि के,
मैने  दोनो कर जोड़े।
मात् कृपा से हर मानव को,
मानवता सुधि आ जाए।
आज नया संकल्प करें हम
*माँ* वरदानी हो जाए।
        ——.
सादर✍,©
*बाबू लाल शर्मा “बौहरा”*
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
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