KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

अभिलाषा द्वारा रचित “माँ तुम दया ममता करुणा की मूरत हो”

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माँ तुम…………………………..
दया ममता करुणा की मूरत हो…
ईश्वर की सूंदर प्रतिकृति हो….
सघन वन की घनी छाया हो…
रेगिस्तान की तपती रेत हो…


विराट विशाल आकाश का आशीर्वाद हो…
रक्षिका बनी सिंहनी हो…..
समुन्दर में उठती सैलाब हो…
पहाड़ो की सुन्दर श्रृंखला हो…


निर्झर झरने की मीठी सोता हो….
फलदार वृक्ष की घनी छाया हो…
धूप की उजली मुस्कान हो..
स्निग्ध चाँदनी की कनात हो….


चमकते टूटे तारों की शगुन हो…
हिमानी ठंडी शीतल वर्षा हो….
गंगा की पवित्र धारा हो …..
अग्नि की गर्म ज्वाला हो….


जीवन की मधुर धुन हो….
मेरे हर दुखों को महसूस करनेवाली,
दिल की गहराइयों से,
बहती अश्रुधारा हो….


माँ तुम……………
निःशब्द प्रेम की गाथा हो….
कैसे तुम्हे शब्दों में बाँध सकूँ….
तुम असीमित विस्तार की ,
परिभाषा हो माँ,
मेरे जीवन की अभिलाषा हो………
माँ……………………….
             तुम्हारी प्रतिकृति 
                                   अभिलाषा अभि

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