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माँ फिर याद आई ( माँ को आत्मार्पित एक कविता )

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माँ फिर याद आई

meri maa
meri maa

मैं जब भी
इस असंख्य भीड़ से
अलग हुआ
या
तिरस्कृत कर ठुकराया गया
मैं जब भी ….
जीवन के अवसादों से घिरा
या लोगों द्वारा
झुठलाया गया
तब-तब
माँ के विचारों का
संबल मिला
किसी दैवीय प्रतिमा की तरह
यथार्थ के धरातल पर
वह मेरा पथ ….
आलोकित करती रही
जब-जब
जीवन की विपत्तियाँ
कुलक्षिणी रात की तरह
मुझे मर्माहत करने लगीं
जब कभी ..
दैत्याकार परछाइयाँ
मुझे अँधेरे में
धकेलने लगीं
तब ..
बचपन की लोरियों ने
उस आत्मविश्वास को
ढूंढ निकाला
जिसे
कहीं रख छोड़ा था मैंने
और
अब तो ….
उस माँ रुपी भगवान से
इतनी सी प्रार्थना है
कि
उसके चरणों की धूल
मेरे मस्तक में
शोभायमान हो
उसके
आँचल का बिछौना
मुझ अबोध की दुनिया का
एक मात्र सराय हो
उस ममतामयी मूरत को
याद करते-करते
आँखें नम हो आई
वक्त के
पथरीले रास्तों पर
आज
माँ फिर याद आई – – – – – –

  प्रकाश गुप्ता ”हमसफ़र” रायगढ़ ( छत्तीसगढ़ )

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