KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

महिला सांसदों पर मार्शल बल का प्रयोग –

पिछड़ा वर्ग के संबंध नये कानून के संदर्भ में आयोजित संसद के सत्र में महिला सांसदों के साथ बदसलूकी की गई है.

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महिला सांसदों पर मार्शल बल का प्रयोग –

लोकतंत्र पर कालिख पिछले दिनों लोकतंत्र के मंदिर माने जाने वाले संसद के उच्च सदन राज्य सभा में पिछड़ा वर्ग संबंधी बिल के संदर्भ में आयोजित सत्र के दौरान महिला सांसदो के साथ धक्कामुक्की की गई। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस पार्टी की महिला सांसद फूलोदेवी नेताम और श्रेष्ठ सांसद के रुप में सम्मानित छाया वर्मा ने अपने बयान में कहा है कि राज्यसभा में सत्र के दौरान वे अपना पक्ष रखना चाहती थी। लेकिन सत्ता पक्ष ने हमारी आवाज दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया। मार्शलो के बल पर महिला सांसदो की भी बोलती बंद करा दी गई। इतना ही नहीं उनके साथ मार्शलों ने बदसलूकी भी की। दोनों ही सांसद अपने साथ सरेआम संसद में हुई इस बुरे व्यवहार के के बारे में बताते हुए रो पड़ी। ऐसी घटना महाभारत के चीरहरण प्रकरण की याद दिलाता है। जो भरी सभा में द्रौपदी के साथ किया गया था। कोई भी महिला सासंद का अपमान होता है, तो यह अकेले उस महिला का अपमान नहीं है। यह उन सभी जनता का, मातृसत्ता का अपमान है, जिनका वे प्रतिनिधित्व कर रही है। महादेवी वर्मा लिखती है कि युगों से पुरुष स्त्री को उसकी शक्ति के लिए नहीं, सहनशक्ति के लिए ही दण्ड देता आ रहा है।

भारत माँ के गालों पर कसकर पड़ा तमाचा है,
रामराज में अबके रावण नंगा होकर नाचा है।

हम गर्व करते हैं कि भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारी संस्कृति कहती है कि ”यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः“। हम नारी को माँ कहते हैं। हमारे नेता महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं। महिला आरक्षण के चर्चे होते हैं। सबका साथ सबका विकास का नारा लगाया जाता है। वहीं संसद में महिला सांसदो के साथ अभद्रता का व्यवहार किया जाता है। यह उस कहावत को चरितार्थ करता है जिसमें कहा गया है कि हाथी के दांत खाने का और होता है, दिखाने का और होता है। अभी अभी ओलंपिक में अपना नाम और देश का नाम रौशन करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया। भाषण में महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी बड़ी बांते कहीं जाती है, मगर वास्तविकता कुछ और ही है।
देश का संसद लोकतंत्र का मंदिर होता है। करोड़ों लोगों के कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर वहाँ गंभीर चर्चे होने चाहिए। किंतु वहाँ उन मुद्दों प्राथमिकता दी जाति है, जिनसे सत्ताधीन दलों का स्वार्थ जुड़ा होता है। भरपूर बहुमत प्राप्त दल के लोग लोकतांत्रिक सत्ता में रहते हुए यह भूल जातें हैं कि, वे पाँच साल के लिए चुने गए हैं। वे अपने संख्या बल का प्रयोग विपक्षियों को डराने, धमकाने, हराने, बदनाम करने, बेईज्जत करने और अपने हितों के लिए कानूनी बदलाव करने के लिए करते हैं।

आज के समय में देश में कुछ अतिमहत्वपूर्ण विषय हैं जिन पर संसद में सकारात्मक चर्चा और सुधार होनी चाहिए। मँहगाई की आग भयावह हो गई है। खाने के तेल की कीमत दोगुना से भी ज्यादा हो गया है। पेट्रोल और डीजल दोनों के मूल्य खून से भी कीमती लगते है। गैस के सिलेंडर हजारी हो गया है। कुछ डेढ़ होशियार लोग कहते है कि मँहगे पेट्रोल खरीदना देशभक्ति है। ये वहीं लोग हैं, जो खुद विपक्ष में रहते थे तो मँहगाई के विरोध में संसद का सत्र रुकवा देते थे। ये वे ही हैं जो मँहगाई के विरोध में धरना, रैली और चक्काजाम कर देते थे। आज जब वे सत्ता में है तो वे जो करें सब अच्छा ही है। कोई विरोध करें तो मार्शल बुलाकर संसद से ही बाहर कर दिए जाते हैं। वे सभी सामान जिनका उत्पादन फैक्ट्री या कंपनी करती है, उनके कीमत आसमान छू रहे हैं। ऐसा लगता है कि उन उत्पादकों पर सरकार का कोई लगाम ही नहीं है। ऐसा लगता है कि सरकार केवल किसानों और अपने कर्मचारियों पर शिकंजा कसना चाहती है।

कोरोना काल में भारतीय स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, दवाई की बदहाली भी शासन को बेहतरी लगती है। ये नेताओ का दोष नहीं है। दरसल सत्ता की आँखों का चश्मा ही कुछ ऐसा होता है कि उसमें सब कुछ अच्छा ही अच्छा दिखता है। मंत्री और बड़े नेताओं के आगमन से पहले ही रातोरात सड़क बना दिए जाते हैं। जहाँ कल तक वीरान था, वहाँ पौधे नहीं सीधे पेड़ ही लगा दिए जाते हैं। ऐसे में सड़कांे की कमी या रास्तों के गड्ढे सरकार को कहाँ दिखेंगे।

जनतंत्र की सफलता के लिए विपक्ष का होना जरुरी है। सत्ता को चाहिए कि विपक्ष के सही सलाह को माने। उनकी बातों को सुने। सरकार की बुराई को सुने और बरदाश्त भी करें। आज स्थिती ऐसी नहीं है। आज तो शासन का विषयगत विरोध करने वाले को भी सीधे राष्ट्रद्रोही करार दिया जाता है। लोकतंत्र के चौथे आधार समाचार और पत्रकारों के यहाँ छापे डलवाए जा रहे हैं । क्या सरकार को भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों के घर का पता मालूम नहीं।

क्या पता फिर अवसर मिले ना मिले योजनाओं के नाम बदले जा रहे है। जबकि नाम नहीं काम बदलने चाहिए। एक अरब की आबादी वाला भारत ओलंपिक में मात्र सात मेडल पाकर प्रसन्न है। ठीक है, पर सच में क्या हमें बहुत खुश होना चाहिए। मुझे लगता है कि हमें खेल के क्षेत्र में उन छोटे छोटे देशों से सीखने की आवश्यकता है, जो हमसे बहुत छोटे होकर भी पदक तालिका में हमसे बेहतर है।
किसानों की आमदनी दुगना करने का लालीपाप देने वाले लोगों के लिए पिछले एक साल से आंदोलन कर रहे किसानो का मुद्दा भी कोई मायने नहीं रखता। बेरोजगारी, बिकते सरकारी उघोग, भ्रष्टाचार, जमाखोरी, प्राईवेट हास्पिटलों – स्कूलों की लूट ये कोई मुद्दा नहीं हैं । इस देश में सबसे बड़ा मुद्दा है – जाति, धर्म, मंदिर, चुनाव, खरीद फरोख्त, विज्ञापनबाजी, ड्रामेबाजी, ढकोसला, जनता को बहलाने के नए नए मुद्दे, आदि।

माँ सरस्वती के भक्त, सती, सावित्री, मदालसा, मैत्रैय, पुष्पा, रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती और जीजाबाई जैसे देवियों की आराधना करने वाले इस देश के संसद में महिलाआंे के साथ अन्याय होता है तो बांकी जगह पर हालात कैसे होंगे, ये चिंतनीय है। महिला सशक्तिकरण की बात करने वालों को व्यवहार में भी नारी का सम्मान करना चाहिए। विपक्ष को भी केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए। वहीं सत्ता पक्ष चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो उन्हें विपक्ष का मान रखना चाहिए। साथ ही संसद में उन्हीं विषयों पर चर्चा हो, कानून बने जो देश के हित के लिए सर्वोपरी है। क्योंकि संसद की कार्यवाही का एक एक मिनट भी बेशकीमती होता है। संसद देश का वो चौपाल है, जहाँ प्रेम, सौहाद्र और नेकी हो। जिसमें करोड़ों लोगों को न्याय मिले। किसी भी स्थिती में संसद को अखाड़ा नहीं बनने दिया जाए।

अनिल कुमार वर्मा, सेमरताल

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