KAVITA BAHAR
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मकर संक्रांति पर कविता

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मकर संक्रांति पर कविता


मधुर – मृदु बोल संक्रांति पर , तिल – गुड़ – लड्डू के खाओ
मिलजुलकर सभी प्रेम – प्यार , समता , सौहार्द बढ़ाओ
महापर्व संक्रांति लाए सदा , खुशहाली चहुँ ओर ,
पतंग उड़ाओ , शुभकामनाएँ लेते – देते जाओ ।

आया – आया करो स्वागत , पर्व संक्रांति का महान
सपने ऊँचे सजाकर तुम , छू लो विस्तृत आसमान
आशाओं की उड़े पतंग , थामो विश्वासों की डोर ,
पुण्य कमाओ आज सभी , देकर प्रेम से कुछ भी दान ।

कितना बढ़िया पावन , मनमोहक है , खुशी का त्योहार
अफ़सोस ! आता नहीं मनोहर , यह त्योहार बार – बार
ख़ुशबू ही ख़ुशबू फैली जा रही , अब तो चारों ओर ,
गन्ने – रस की खीर , तिल – गुड़ के लड्डू होंगे तैयार ।

अन्य राज्यों के साथ अब तो , पंजाब भी सराबोर
गूँजता जा रहा लोहड़ी के , संगीत का मधुर शोर
सुन्दर मुंदरिए मनोहर गाना , सबको ही है भाता ,
भंगड़े – गिद्दे के साथ , थामते सब पतंग की डोर ।

रवि रश्मि ‘ अनुभूति ‘

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