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मानवता – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना के माध्यम से कवि , इंसानियत और मानवता का पता खोजना चाहता है | रचना के अंत में उसे एहसास हो ही जाता है कि आखिर मानवता का सही ठिकाना कहाँ है |
मानवता – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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मानवता – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

खा गई ज़मीन
या खा गया आसमां
ऐ मानवता तू है कहाँ ?
ऐ मानवता तू है कहाँ ?
उड़ गई क्या शोले बनकर
आसमां में

मैं ढूँढता हूँ तुझे
ए इंसानियत
तेरा ठिकाना है कहाँ ?
तेरा ठिकाना है कहाँ ?

लोग कहते हैं
खुदा हर एक के
दिल में बसता है
फिर यह
बर्बरतापूर्ण व्यवहार देख

थरथराती ज़मीन देख
कांपती ज़मीन देख
कांपता जीवन देख
कहाँ छुप गया है खुदा ?

मैं ढूँढता हूँ तुझे
यहाँ और वहाँ
यहाँ और वहाँ

ऐ खुदा
क्या तू
युग परिवर्तन की
देख रहा है राह

मैं
मानवशोलों,
धर्माधिकारियों
के मुंह से निकले
अनैतिकपूर्ण
बोलों के बीच

सारी मानव
जाति में
एकता , अखंडता ,
सांस्कृतिकता को
ढूंढ रहा हूँ
ये सब हैं कहाँ ?
ये सब हैं कहाँ ?

ऐ खुदा
यदि तुझे
पता हो
तो बता

चारों ओर
मच रही चीख
चित्रों में
तब्दील होता
मानव शरीर

फिर भी उनका
गंवारा नहीं करता
ज़मीर
ये भटकते विचार

ये आतंकवाद
मानव संस्कृति
मानव सभ्यता
मानव संस्कारों
को करते तार – तार

आज मानव जीवन पर
कर रहे
बार – बार वार
शायद खुदा
युग परिवर्तन की आड़ में

मानव मस्तिष्क
मानव मन
को टटोल रहा है
उसकी जिद
व भावनाओं को

सच व झूठ के
तराजू में
तौल रहा है
और कह रहा है

अब तो रुक
अब तो संभल
अब तो अपनी
अनैतिकतापूर्ण ,
असामाजिक,
कायरतापूर्ण ,
आतंकवादी ,
अमनावतावादी
गतिविधियों पर
लगा विराम

क्योंकि
जिस विस्फोट
से अभी – अभी
तूने जिस दुधमुहें
बच्चे
के मासूम
व कोमल तन
को छोटे – छोटे
टुकड़ों में
बिखेर दिया है

वह कोई और नहीं
मैं खुदा ही था
तुम सब के बीच
मैं खुदा ही था
तुम सब के बीच
मैं खुदा ही था
तुम सब के बीच |

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