माँ का मन शुचि गंगाजल है –  बाबूराम सिंह

कविता

  माँ का मन शुचि गंगाजल है
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सकल जगत की धोती मल है।
माँ का मन सुचि  गंगाजल  है।।

हित – मित   संसार  में   स्वार्थ,
भ्राता,पत्नि  के प्यार में स्वार्थ।
बेटा – बेटी  आदि   जितने  भी-
सबके सरस व्यवहार में स्वार्थ।

पावन  माँ  का  प्यार  अचल है।
माँ  का  मन  सुचि  गंगाजल है।।

कूछ भी हो कभी नहीं घबडा़ती,
गजब  अनूठी   माँ   की   छाती।
पति , पुत्र   हेतु   आगे   बढ़कर-
माँ  यमराज से  भी  लड़  जाती।

माता  सभी  प्रश्नों   का  हल  है।
माँ का  मन  सुचि गंगा  जल  है।।

सभ्यता,संस्कार कुबेटा में  बोती,
माता कदापि कुमाता नहीं होती।
दीनता,दुख ,विपत्ति को  सहकर-
देती  जग   को  सत्य  की  मोती।

सभय अभय करती  हर  पल है।
माँ  का मन  सुचि  गंगा जल  है।।

सुख – शान्ति   सरस   उपजाती,
सबका   मान   सम्मान   बढा़ती।
जग  सेवा  में   सर्वस्य   लुटाकर-
मन  ही   मन   हरदम  मुस्काती।

जग सर्वोपरि  सेवा  का  फल  है।
माँ  का  मन सुचि  गंगा  जल  है।।

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बाबूराम सिंह कवि
बड़का खुटहाँ , विजयीपुर
गोपलगंज(बिहार)841508
मो०नं० – 9572105032
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