KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मायका पर कविता

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मायका पर कविता

मान मनौव्वल मायका, ममता मनोविचार।
मंगल मय मनबात में, मामेरा मनुहार।।

लाड़ लडाते थे सभी, खट्टी मीठी बात।
भौजाई भाई भले, भेट भये भरमार।।

पढ़ना खाना खेलना, रहना सब घर संग।
भाग्यवान भलमानसी,भगिनी भावन भार।।

बड़े बुजुर्गो का सदा, मिलता गुरु आशीष।
दादाजी दादी भले, दया दान दातार।।

पेड़ पालते, प्रेम से, जैसे भगिनी बंधु।
द्वारे द्वारे दीखते, दरखत दौर दुलार।।

याद बहुत आते सखी, प्रीत रीत वे गीत।
पीहर पथी परिक्रमा,परिजन प्रिय परिवार।।

पीहर में उन्मुक्त थी,तितली विहग समान।
प्यार प्रीत परिपालना, पावन प्रेम प्रसार।।

कैसे बचपन भूल कर, भाए यह ससुराल।
सगा सनेही साथिया, सर्व सुलभ सहकार।।

माँ की संगति मायका, बुआ भाभियाँ बंधु।
सादर सबके साथ से, सीख समझ संस्कार।।

बातचीत बाकी बहुत, बालपनी बकवास।
जाती जब जब मायके, याद करूँ हर बार।।

बिलखाते बंधन बने, बड़भागी बहुसास।
पीहर सा सुख है नहीं, बीता सुख आसार।।

घर की लक्ष्मी पद मिला, खटने को दिन रात।
यादों में बस मायका, मात पिता घर द्वार।।

सास ससुर पति साथ मे, ननदी देवर जेठ।
पीहर रमती कामना, भाव सुभागी नार।।

मात पिता तीर्थ लगे,परिजन प्रिय सब मान।
यदा कदा होती सखी, इसी बात पर रार।।

शर्मा बाबू लाल सुन, पीहर स्वर्ग समान।
पति परमेश्वर पूजती, पीहर पंथ निहार।।

बाबू लाल शर्मा, “बौहरा”
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान

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