मेरा मन लगा रामराज पाने को

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मेरा मन लागा रामराज पाने को ।
तड़प रहा जन जन दाने-दाने को ।
पलते रहे सब उद्योग धंधे ,
ना हो सड़कें, चौराहे गंदे ।
अवसर मिले ऐसा कि
ऋणी हो ऋण चुकाने को ।
अन्याय को मिले सजा
विचरित हो सके स्वतंत्र प्रजा ।
नौबत आए ना वो दिन
कि शहीद हो जाए भुलाने को ।
राम तेरी गंगा हो गई मैली ।
चहुं दिक् पर भ्रष्टाचार फैली ।
कैसे गर्वित शीश हो जग में
जब कर्म हो, शीश झुकाने को ।

मेरा मन लगा रामराज पाने को।।

मनीभाई नवरत्न

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