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मेरे गुरू – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में कवि ने अपने गुरु की महिमा को शब्दों के माध्यम से पंक्तिबद्ध किया है |
मेरे गुरू – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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मेरे गुरू – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

वह दिन मुझे आज भी
याद है
जब मुझे भी ज्ञात नहीं था
कि जिन पुण्यमूर्ति
के सानिध्य में जीवन के
बाल्यकाल को जी रहा हूँ मै

मेरे जीवन का सत्मार्ग
बन मुझे
जिंदगी के चरम पर
पहुंचा
मेरे जीवन को सार्थक
बना देगा
ये
शायद
मेरे अंदर की भावना थी
या मेरी कर्मपरायणता
या फिर
उस परमपूज्य
परमात्मा
का
अप्रत्यक्ष आदेश
जिसने मुझे उनकी ओर
सेवा भाव से प्रेरित
कर
उनका आशीर्वाद
प्राप्त करने का
सुअवसर प्रदान किया
मुझे
उनकी वैराग्यपूर्ण छवि
अपनी ओर आकर्षित
करती थी
साथ ही उनका
लोगों के
प्रति मानवपूर्ण
व्यवहार
बच्चों के प्रति
दुलार
धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी
आस्था
परमात्मा से उनका प्रत्यक्ष मिलन
समय – समय
पर उनके द्वारा
छोटे – छोटे
उद्धरण के माध्यम से
दी गई सीख
आज भी मेरे जीवन को
उदीयमान
करती है
सभी धर्मों में उनकी आस्था
धार्मिक ग्रंथों में
समाहित विचारों पर उनका अटूट विश्वास
मुझ पर
उनका पड़ता
अनुकूल प्रभाव
उनके
हर क्षण
हर पल कि
गतिविधियां
किसी भी जीव को
अपना जीवन पूर्ण
करने
के लिए काफी था
मै धन्य हूँ उन पुण्यमूर्ति
आत्मा का
जिनके सुविचारों
संदेशों का प्रसाद पाकर
अपने आपको आनन्द विभोर
पा रहा हूँ मैं
मेरी जीवन की
प्रत्येक
उपलब्धि
उस परमपूज्य
गुरुदेव
की आराधना
व साधना प्रतिफल है
मै उस पवित्र
आत्मा की वंदना करता हूँ
उसे साष्टांग
प्रणाम करता हूँ
जय गुरुवे नमः |

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