KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मेरे जीवन की वक्र रेखा

मेरे जीवन की वक्र रेखा
पद्म मुख पंडा
निवास पद्मिरा सदन महा पल्ली

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मेरे जीवन की वक्र रेखा

मैं, एक निहायत शरीफ़ आदमी हूं,
ऐसा लोग अक्सर कहते हैं!
पर उन्हीं महाशयों को, जब जाना,
दूसरों से ,कुढ़ते रहते हैं!
उन शरीफ़ लोगों के साथ,
मुझे भी, वक़्त बिताना पड़ता है,
असहमत होने की स्थिति में भी,
हां में हां मिलाना , पड़ता है!
स्थिति यद्यपि विचित्र है,
तथापि ,इसका, दूसरा भी चित्र है!
गहन विचार करने पर,
एक अद्भुत आनन्द का अनुभव होता है,
मनुष्यता अभी जीवित है,
तभी, कोई साथ हंसता है, रोता है!
मेरे परिवार में, मुझे कौन प्यार करता है?
यह सवाल, मानस में, बार बार आता है,
माता, पिता,बहन, भाई हर कोई जताता है,
इस नश्वर संसार में, हमारा कौन सा नाता है?
फिर, जब मुड़कर, अपनी ओर, देखता हूं,
मुझे न जाने क्यों, अपराध बोध होता है,
मैं कितना पाखंडी हूं, इस अनुभूति से,
सच कहूं, बहुत क्रोध आता है!
खुद को पाता हूं, निहायत एक स्वार्थी व्यक्ति,
मेरा पूरा तन, पसीने से भीग जाता है!
कितनी रखते हैं, हम, दूसरों से अपेक्षाएं?
बेहतर हो, उनके लिए, कुछ, कर दिखाएं!
अभी भी, अध्ययन करता रहा हूं,
अपने बारे में, अपने कर्मों का लेखा,
यही है, मेरे जीवन की, वक्र रेखा!!

स्वरचित एवम् मौलिक,
पद्म मुख पंडा,
वरिष्ठ नागरिक, कवि एवं विचारक
सेवा निवृत्त अधिकारी, छत्तीस गढ़ राज्य ग्रामीण बैंक

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