मेरी पलकें नमाज़ी हुई

मेरी पलकें नमाज़ी हुई

मेरी  पलकें  नमाज़ी  हुई  तेरे  दीदार  से
नूर बरसता है यूँ पाक़  तेरे रुख़सार से ।
मुजस्सिम ग़ज़ल हो मेरी, उम्र की ताजमहल का
बेयक़ीन  हुआ  नहीं  मैं  इश्क़  में  ऐतबार  से ।
गोया  कि  तुम  मेरे हाथ  की लकीर हो या रब
हाथ  होता  नहीं  तो  क्या  होता जाँ निसार से ।
मसरूफ़ियत  में  भी  हमने  सजदे  किये  तेरे
वीरान  जज़ीरे  में  बाहर  आई  फिर प्यार  से ।
शैदाई  हैं  शराफ़त  के हम   सुख़नवर ऐ  “अब्र”
तसबीह-ए-दिल छोड़कर , सब ले जाओ क़रार से ।

कलम से
राजेश पाण्डेय “अब्र”
         अम्बिकापुर

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