KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मेरी माँ -किरण अवधेश गुप्ता

आज अपने छोटे से कविता संग्रह”भावनाओं का सफर”से जो मोती मैं चुनकर लायी हूँ वो है”माँ”,जिसकी व्याख्या के लिए हर शब्द अपर्याप्त है।

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मेरी माँ -किरण अवधेश गुप्ता



‘माँ’ शब्द में ही छुपी है
ममता भरी एक पुकार
छुपा ले मईया आँचल में तू
छोटी सी है यही गुहार।

जब मैं आत्मा का स्वरुप थी
ईश्वर ने ये कहा था मुझको
गर दे दू मैं तुमको खुशियाँ
क्या दोगी बोलो तुम मुझको।

नासमझ थी उस समय मैं
खुशियों का अर्थ समझ न पाई
गर्भ में जब भेजा मुझको तब
बात समझ में मुझे ये आई।

हर पल रखती ध्यान मेरा तुम
अपना हर पल मुझे दिया
दुनिया में आने से पहले
खुशियों से दामन मेरा भर दिया।

जब संसार में आयी तब से
हर पल हर क्षण मुझे दिया
इसके बदले मैया मेरी
मुझसे कुछना कभी लिया।

मैं रोती तब तुम भी रोती
मैं हंसती तुम हंस जाती
चोट कभी जब मुझे थी लगती
दर्द से मैया तुम घिर जाती।

बड़ी हुई तब पता लगा ये
यहां तो बेटी अनचाही है
पर मैया तेरी नज़रों में
बात नज़र ये कभी ना आई।

जीवन के हर सुख-दुख का
तूने मुझको पाठ पढ़ाया
खुद निरंक थी फिर भी मैया
तूने ज्ञान का मार्ग दिखाया।

शादी करके मैया मेरी
जब अपने ससुराल में आयी
तेरे सिखाये संस्कार वो सारे
जीवन में मेरे खुशियां ले आई।

मैया मेरी जो भी हूँ मैं
बस तेरी ही छाया हूँ
ये रंग-रूप ,ये नयन-नक्श
बस मै तेरी ही काया हूँ।

मैं भी बनना चाहूँ मैया
बस तेरे ही जैसी प्यारी
छोटों को प्यार बड़ो को आदर
तेरी जैसी ही बनूँ मैं न्यारी।

जैसा प्यार मुझे मिल पाया
मैं भी अपने बच्चों को दूँ
मुझको भी प्यार करें वो उतना
जितना मै करती तुमसे हूँ।

चाहूँ ईश्वर से बस इतना
खुश रहो तुम सदा यूं ही
तेरे प्यार का आँचल मैया
सदा रहे मुझ पर यूं ही।

हर जनम में मैया मेरी
तेरी बेटी बनकर जन्मू मैं
बस यही तमन्ना रही हैं दिल में
गर्व से सिर तेरा ऊँचा कर दूं मैं।

लिखा है ये मात्तृत्व दिवस पर
पर अंकित है ये दिल पर ये
हर जनम में ईश्वर मुझको
तेरी जैसी माँ ही दे।



श्रीमती किरण अवधेश गुप्ता

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