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मिलते हैं हमसफर

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मिलते हैं हमसफर

कैसा भी सफर हो
साथ से कट जाता
सुविधा से  व्यक्ति
मंजिल तक पहुँचता ।


अब सफर स्कूल तक
सफर खेल मैदान का
पनघट तक का हो
या फिर मंदिर मस्जिद
या उत्सव त्यौहार का
सब हम सफर रहते
सुख दुख साझा सहते।


जीवन के सफर में भी
एक हम सफर चाहिए
सुहाना हो जाये सफर
समय हो जाये सुखकर।


नियम बनाये गये हैं
समाज की व्यवस्था में
धर्म सम्मत विधान में
देश के लिखे संविधान में
कुछ शर्तों कुछ नियमों में
हमसफर  बन साथ निभाने के।


कभी परिवार के सहयोग से
कभी प्यार के संयोग से
मिलते हैं हमसफर  ।


जिन्दगी निभाने के लिए
संग जीने संग मरने के लिए
जन्मों का रिश्ता निभाने
चल पड़ते हैं जीवन की राहों पर।
पड़ते हैं पाँव कभी फूलों पर
तो टकराते कभी काँटों से
संभालते एक दूजे को
जीते एक दूजे के लिए
बसाते अपना स्वर्णिम संसार।

लुटाते एक दूजे पर प्यार
त्याग समर्णण विश्वास पर
बँधी रहती प्रीति की डोर
छोड़ते नहीं कभी इसका छोर।


पर जब स्वार्थ अहं टकराते
दोनों अपनी अपनी पर आते
टूटता विश्वास, बढता अहंकार
डगमगाने लगते  कदम
अलग हो जाते हमसफर।


बिखरती गृहस्थियाँ
बिलखते बच्चे
उजड़ जाते आशियाने
होता रहता दोषारोपण
सोचें समझें समझाएं
सम्बन्धों का महत्व।


परिवारजनों की अपेक्षाएं
भावी पीढी का भविष्य
निभायें निष्ठा से
अपना पूर्ण उत्तर दायित्व
अधिकारों का आधार कर्त्तव्य
संबधों का आधार प्रेम
बचायें अपनी संस्कृति
अपने रीत रिवाज।
सुरक्षित बच्चे व परिवार
बने फिर सच्चे हम सफर।


पुष्पा शर्मा “कुसुम”

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