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मुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता है

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मुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता है

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जिसे चाहो नज़र से वो ही अक्सर दूर होता है
मुहब्बत में ज़माने का यही दस्तूर होता है
बुलंदी चाहता पाना हरिक इंसान है लेकिन
मुकद्दर साथ दे जिसका वही मशहूर होता है ।
सभी के हाथ उठते हैं इबादत को यहाँ लेकिन
ख़ुदा को किसका जज़्बा देखिये  मंजूर होता है।
उलटते ताज शाहों  के यहाँ देखें हैं हमने तो
अभी से किसलिए तू इस कदर  मग़रूर होता है ।
हज़ारों रोज़ मरते हैं यहाँ पैदा भी होते हैं
कभी किसकी कमी से यह जहाँ बेनूर होता है।
तुम्हें कैसे दिखाई देगी इस घर की उदासी भी
तुम्हारे आते ही चारों तरफ़ जो नूर होता है।
अभी से फ़िक्र कर रानी तू उनके बख़्शे जख़्मों की
इन्हीं ज़ख़्मों से पैदा एक दिन  नासूर होता है।
      जागृति मिश्रा *रानी
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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