मुसाफिर हैं हम जीवन पथ के

मुसाफिर हैं हम जीवन पथ के

मुसाफिर हैं हम जीवन पथ के
राहें सबकी अलग-अलग
धूप-छांव पथ के साथी हैं
मंज़िल की है सबको ललक।

राही हैं संघर्ष शील सब
दामन में प्यार हो चाहे कसक
पीड़ा के शोलों में है कोई
कोई पा जाता खुशियों का फलक।

मुसाफिर हूँ मैं उस डगर की
काँटों पर जो नित रोज चला
मधुऋतु हो या निदाघ, पावस
कुसुम सदा काँटों में खिला।

संघर्ष ही मुसाफिर की जीवन तान
अंतर्मन बेचैन हो चाहे
जिजीविषा प्रचंड बलवान।
अनुकूल समय की आशा ही
पथिक के कंटक पथ की शान।

जीवन पथ के अनजान मुसाफिर
झंझा से नित टकराते हैं
नैया बिन पतवार हो गर तो
भंवर में भी राह बनाते हैं।

  गर्त हैं अनजानी राहों में कई
चुनौतियों के भी शिखर खड़े हैं
मुसाफिर असमंजस में होता है
तमन्नाओं के भी महल बड़े हैं।

जीवन पथ संग्राम सा भीषण
उल्फत नहीं उदासी है
मृगतृष्णा का मंजर मरु में
मुसाफिर की रूह भी प्यासी  है।

सुख दुख में समभावी बनकर
राही को मंज़िल मिलती है
अदम्य साहस है नींव विजय की
अमावस्या भी धवल बनती है।

मुसाफ़िर हूँ मैं अजब अलबेली
हिम्मत शूलों पर चलने की
पथरीले पथ पर लक्ष्य है कुसुम का
नैराश्य त्राण को हरने की।

कुसुम लता पुंडोरा

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