KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मुस्कान पर कविता

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मुस्कान पर कविता

मुझे बाजार में
एक आदमी मिला
जिसके चेहरे पर
न था कोई गिला
जो लगतार
मुस्करा रहा था
बङा ही खुश
नजर आ रहा था
मैंने उससे पूछा कि
कमाल है आज
जिसको भी देखो
मुंह लटकाए फिरता है
तनावग्रस्त-सा दिखता है
आपकी मुस्कान का
क्या राज है
मुस्करा रहे हो
कुछ तो खास है
उन्होंने कहा
मुझपे भी
महंगाई की मार है
मुझपे भी
गम सवार है
यहाँ दुखदाई
भ्रष्टाचार है
ऐसे में
खुश रहना कैसा
मुस्कराता नहीं
मेरा मुंह ही है
ऐसा

-विनोद सिल्ला

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2 Comments
  1. Meena says

    Very Nice

  2. अनाम says

    बहुत खूब