KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नारी की व्यथा

0 398

नारी की व्यथा

Naari
नारी चेतना

बरसों पहले आजाद हुआ देश
पर अब भी बेटी आजाद नहीं
हर बार शिकार हो रही बेटियां
है यह एक बार की बात नहीं ।

जिस बेटी से पाया जन्म मनुज
उसी का तन छल्ली कर देता है
मात्र हवस बुझाने की खातिर
मासूम कलियों को नोच देता है

इंसानियत मर चुकी है अब तो
इंसानो में शैतान का वास होता है
उस हवसी दरिंदे को क्या मालूम
परिवार उसका कितना रोता है।

तन मन की बढ़ती हुई भूख ने
बच्चो को बना डाला निवाला है
बेटियों को मनहूस कहने वालों
तुमने ही हवसी कुत्तो को पाला है

बेटियों पर लाखो बंदिशें लगाकर
समाज ने उसेअबला बना डाला है
खुला छोड़ लाडले बेटो को देखो
इंसानियत पर तमाचा मारा है।

आज तो बेटी किसी और की थी
कल तुम्हारी भी तो हो सकती है
कुचल डालो हवसी दरिंदों को
बेटी और दुख नहीं सह सकती है

क्रान्ति, सीतापुर , सरगुजा छग?

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.