KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

कविता बहार बाल मंच ज्वाइन करें @ WhatsApp

@ Telegram @ WhatsApp @ Facebook @ Twitter @ Youtube

नास्तिकता पर कविता

1 225

नास्तिकता पर कविता

हमें पता नहीं
पर बढ़ रहे हैं
धीरे धीरे
नास्तिकता की ओर
त्याग रहे हैं
संस्कारों को,
आडम्बरों को
समझ रहे हैं
हकीकत
अच्छा है।
पर
जताने को
बताते हैं
मैं हूँ आस्तिक।
फिर भी
छोंड रहे हैं
हम ताबीज
मजहबी टोपी
नामकरण रस्म
झालर उतरवाना
बहुत कुछ।
बढ़ रहे हैं
धीरे धीरे
नास्तिकता की ओर
क्योंकि
नास्तिकता ही
वैज्ञानिकता है।
 राजकिशोर धिरही
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.

1 Comment
  1. विनोद सिल्ला says

    बहुत सुन्दर