KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नवरात्र शक्ति आराधना

आश्विन नवरात्र में मां दुर्गा की स्वरचित शक्ति आराधना

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आश्विन नवरात्र की शुभकामनाओं के साथ माँ शक्ति को प्रसन्न करने हेतु स्वरचित आराधना

ma-durga
मां दुर्गा

नवरात्र-शक्ति-आराधना

(सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख-पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा , हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।)…..2

स्मरण तेरा शुरू करें हम ,
घट को स्थापित करके।
घट-घट में है तू ही बसती ,
शक्ति जागृत करके ।
अखण्ड जोत तेरी नव दिन बालूं ,
मन से ज्ञापित करके ।
धूप ,अगर और करूँ क्या अर्पण ,
तू ही मुझे समझा री ।
सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा ,हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।

भक्ति ये मन की पाट धरूँ माँ ,
चौक को पूरित करके ।
अन्न अंकुरित करना भी है ,
माट में मिट्टी भरके ।
झांकी तेरी लगती है निश्छल ,
देख-देख मन हरखे ।
मन के अब सब , द्वार में खोलूं ,
आ इसमें बस जा री ।
सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा ,हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।

चैत्र-आश्विन ,शुक्ल प्रतिपदा ,
पूजन शुरू करें हम ।
अगर जला कर ज्योति जलाएं ,
अभी मिटे यह जग-तम ।
थाल सजा कर करें आरती ,
नाचे गाएँ सब हम ।
तेरा साथ रहे अब निश दिन ,
आशीष तू अपना लूटा री ।
सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा ,हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।

नव दिन तक नव रूप हैं तेरे ,
एक-एक करूँ पूजन ।
पूजूँ-गाऊँ तुझे सुनाऊँ,
नव दिन तक और क्षण-क्षण ।
महिमा तेरी सब जग जाने ,
क्या री करूँ अब वर्णन ।
इस जग को सब तू बतलाती ,
अब क्या-क्या लिखूं बतला री ।
सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव-कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा, हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।

नव दिन जग करे शक्ति पासना ,
विध-विध रूप की तेरे ।
हो ब्रह्मी या गृहस्थ भले हो ,
सन्यासी बहुतेरे ।
शक्ति सभी को तू वर देती ,
मनुज हो दनुज भलेरे ।
कन्या रूप को करके पूजित ,
जग सिद्धि प्राप्त करे री ।
(सर्व अमंगल , मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी ।
जग-तम में तू ही उजियारी ,
जीव कंटको में फुलवारी ।
अब तो आजा ,हे जग माँ तू ,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी ।)…2

✍✍ *डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज.)*

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