नीर – नेह, युग-चालीसा

नीर – नेह, युग-चालीसा


दोहा–
मेघपुष्प पानी सलिल, आपः पाथः तोय।
लिखूँ वन्दना वरुण की,निर्मल मति दे मोय।।१
मेह नेह का रूप जल, जीवन का आधार।
बिंदु बिंदु से सिंधु है, समझ स्वप्न साकार।।२
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चौपाई–
प्रथम पूज्य गौरी के नंदन।
मात शारदे का शुभ वंदन।।
वरुण देव, जल महिमा गाथा।
लिखूँ सुनाउँ नवाकर माथा।।१
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नेह नीर मनुजात निभाए।
भू पर तभी नीर बच पाए।।
जल से जीवन यह जग जाना।
जल मे प्राणवायु को माना।।२
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नभ से मेघ पुष्प बरसाए।
सलिल स्रोत सारे सर साए।।
जल से जीव और परजीवी।
जल से वसुधा बनी सजीवी।।३
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वर्षा जल होता अति निर्मल।
रक्षण करना सब को ही मिल।।
जल से अन्न अन्न से जीवन।
जल बिन कैसे हों धरती वन।।४
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रहे संतुलित वितरण जल का।
नीर सहेज रखें हित कल का।।
जल कुल भाग तीन चौथाई।
जल की महिमा सके न गाई।।५
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घर घर में वर्षा जल रक्षण।
सत संकल्पों हित संरक्षण।।
जल गागर में हो या सागर।
तन और धरती भाग बराबर।।६
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बूँद बूँद जल सुधा समझिए।
जल से जीवन मोल परखिए।।
धरती जल या वरषा जल हो।
नीर जरूरत तो पल पल हो।।७
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जल से पेड़ पेड़ से वसुधा।
नीर न्यूनता बहुता दुविधा।।
प्राणी तन मे रक्त महातम।
सृष्टि हेतु जल जीवन आतम।।८
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नयन नीर सूखे नही अपने।
व्यर्थ नीर खोएँ मत सपने।।
वरुण देव हैं पूज्य हमारे।
धरा चुनरिया रंगत डारे।।९
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सूर्य ताप जल वाष्प बनाए।
पवन वेग नभ तक पहुँचाए।।
देव इन्द्र बादल बन बरसे।
वर्षा जल से वसुधा सरसे।।१०
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दोहा–
जनहित पानी देशहित, जागरूक हो मीत।
जीवन के आसार तब, जल स्रोतों से प्रीत।।३
नीर धरोहर सृष्टि की, रखलो इसे सहेज।
करना सद उपयोग है, अति दोहन परहेज।।४
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चौपाई–
कूप बावड़ी ताल तलाई।
युगों युगों पय धार पिलाई।।
सब जीवों की प्यास बुझाए।
मीन मकर मोती जल जाए।।११
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बाँध नहर से फसल सरसती।
खेत खेत मुस्कान पसरती।।
शंख कमल जल बीच निपजते।
जिनसे देव ईश सब सजते।।१२
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वर्षा जल को बचा सहेजो।
यह संदेशा घर घर भेजो।।
जल से ताल तलैया कूपा।
बापी सरवर सिंधु अनूपा।।१३
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बूँद बूँद से घट भर जाते ।
दादुर ताल पोखरे गाते।।
खाड़ी सागर से महासागर।
मरु भूमि में अमृत गागर।।१४
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नेह मेह का जल कण सपना।
छत का नीर कुंड भर अपना।।
झील बाँध सर सरित अनेका।
भिन्न रूप रखते जल एका।।१५
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गाँव राह बहु कूप पुराने।
स्वच्छ रखों तब लगे सुहाने।।
सागर खारा जल भर ढोता।
क्रिस्टल बने राम रस होता।।१६
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गिरि पर्वत रज नीर सहेजे।
जीव जगत हित धारा भेजे।।
शीत नीर जम बर्फ कहाता।
बहे पिघल जल धार बनाता।।१७
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वही धार नदिया बन जाती।
कुछ नदियाँ बरसाति सुहाती।।
बरसे जब घन घोर घटाएँ।
ध्यान रहे जल व्यर्थ न जाए।।१८
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सम वर्षा कृषि हित सुखकारी।
अन्न फसल उपजाए भारी।।
जल अतिवृष्टि बाढ़ कहलाती।
अल्पवृष्टि हो फसल सुखाती।।१९
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थार मरुस्थल जल अति न्यूना।
चतुर सुजन जल रखे सतूना।।
मध्यम जल वर्षा हित कारी।
जीव जन्तु मानव उपकारी।।२०
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दोहा–
वारि अंबु जल पुष्करं, अम्मः अर्णः नीर।
उदकं घनरस शम्बरं, रक्ष मनुज मतिधीर।।५
हो आँखों में नीर तो, देख समझ जन पीर।
भू पर जल महिमा बड़ी, जानें मीत सुधीर।।६
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चौपाई–
कैलासन में पूज्य शिवालय।
नेह नीर से सजे हिमालय।।
हिमगल नीर, मेह से नीरा।
बह के बने सरित गम्भीरा।।२१
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नदियाँ निज पथ स्वयं बनाती।
खेती फसल धान सरसाती।।
जीव जन्तु वन तरु संजीवन।
नद सर नीर मीन मय धीमन।।२२
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घर घर टाँके हम बनवाएँ।
वर्षा जल से जो भरजाएँ।।
नदियों के तट तीर्थ हमारे।
पुरा सभ्यता नदी किनारे।।२३
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बापी पोखर सरवर सारे।
स्वच्छ रहें जल स्रोत हमारे।।
नदियाँ ही जन जीवन धारा।
प्यारा लगता सरित किनारा।।२४
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उत्तम जल की ये सद् वाहक।
गन्द प्रदूषण मत कर नाहक।।
नौका चले जीविका पलती।
माँझी चले ग्रहस्थी चलती।।२५
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टाँके स्वच्छ भरो जल चंगे।
हर हर बोलो घर घर गंगे।।
नदी नीर पावन जग माने।
सरिता को माँ सम सम्माने।।२६
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जल जीवन हित बहुत जरूरी।
अति दोहन बच मनुज गरूरी।।
गंगा माँ पावनतम सरिता।
काव्य कार हारे लिख कविता।।२७
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श्रमिक खेत पर बना तलाई।
जीवट कृषक फसल लहराई।।
यमराजा की श्वास अटकती।
सबको पाप मुक्त नद करती।।२८
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अपने सरवर बाँध हमारे।
घर के टैंक स्वच्छ परनारे।।
गंगा माँ सम पावन धारा।
छू कर दर्शन पुण्य हमारा।।२९
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गाँव गाँव जल स्रोत सँभालें।
स्वच्छ किनारे पूल बनालें।।
यमुना यादें गंगा भगिनी।
कान्हा- लीला गोपी- ठगनी।।३०
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दोहा–
सरिता तटिनी तरंगिणी, द्वीपवती सारंग।
नद सरि सरिता आपगा, जलमाला जलसंग।।७
सागर सर सरिता सभी, सदा सुभागे नीर।
मनुज सभ्यता थी बसी, पुरा इन्ही के तीर।।८
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चौपाई–
कभी भूमि मरु पर था सागर।
मानुष करनी भटकी गागर।।
बह कर सरस्वती नद धारा।
अब तक गर्व गुमान हमारा।।३१
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सरस्वती की राम कहानी।
कहते सुनते पुरा जुबानी।।
नदी नर्मदा का हर कंकर।
लगता हमको भोला शंकर।।३२
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माही और बनास पुनीता।
मरु मेवाड़ी प्राण प्रणीता।।
सरयू घग्घर माही चम्बल।
नदियाँ सब धरती को सम्बल।।३३
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वर्षा जल बहने से बचता।
तभी खेत में हलधर हँसता।।
नदियों पर जल बाँध बनाते।
बिजली हित संयत्र लगाते।।३४
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पेड़ लगा कर मेघ बुलाएँ।
शुद्ध रहे जल स्रोतों आए।।
बाँध बने से बहती नहरें।
इनसे जल स्तर भी ठहरे।।३५
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नहरी जल खेतों तक जाए।
खेत खेत फसलें लहलाए।।
हम भी घर घर कुण्ड बनाले।
उस जल से बगिया महकालें।।३६
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जलपथ साफ हमेशा रखने।
संभव घट टाँके रख ढँकने।।
इसीलिए जल नदी सफाई।
करना सब यह काज भलाई।।३७
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भूमि नीर वर गड़ा दफीना।
अतिदोहक नर है मतिहीना।।
नदी मिले ज्यों सागर नीरा।
पंच तत्व में मिले शरीरा।।३८
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घर घर गाँव शहर हो चेतन।
संग्रह कर लें नीर निकेतन।।
तन मन नदियाँ नीर सँवारो।
स्वच्छ नीर रख भावि सुधारो।।३९
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सखे बचाना घर घर पानी।
धरा रहे मम चूनर धानी।।
शर्मा बाबू लाल सुनाई।
नेह नीर लिख कर चौपाई।।४०
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टाँके घर घर में बन जाए।
बूँद बूँद जल की बच जाए।।
चालीसा मन चित पढ़ लीजे।
जल नदियों का आदर कीजे।।४१
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दोहा–
अपगा लहरी निम्नगा, निर्झरिणी जलधार।
सदा सनेही सींचती, करलो नमन विचार।।९
नीर वायु से ही बने, पवन नीर से मान।
शर्मा बाबू लाल यह, सहज शोध विज्ञान।।१०
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✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, *विज्ञ*
सिकंदरा, 303326 जिला- दौसा ,
राजस्थान, ९७८२९२४४७९

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