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नशा पर कविता- सुकमोती चौहान

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नशा पर कविता

नशा नाश की सीढ़ियाँ,सोच समझ इंसान।
तन को करता खोखला,लेकर रहती जान।।

बड़ी बुरी लत है नशा,रहिए इससे दूर।
बेचे घर की संपदा,वह होकर मजबूर।।

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यह जीवन अनमोल है,मदिरा करें न पान।
विकृत करे मस्तिष्क को,पीना झूठी शान।।

नशा पान करके मनुज,स्वर्णिम जीवन खोय।
अंग अंग फैले जहर,शीश पकड़ कर रोय।।

बिता जवानी मौज में,घर को करे न याद।
कलह बढ़ा परिवार में,धन जन हो बर्बाद।।

✍ सुकमोती चौहान रुचि
बिछिया,महासमुन्द,छ.ग.
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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